जानिए रिवर्स मॉर्गेज में क्या हैं टैक्स लायबिलिटी, इन पॉइंट्स से समझिए


जब रिवर्स मॉर्गेज स्कीम उपलब्ध होती है तो कर्जदाता से पेमेंट्स सीधे या वार्षिकी के तहत एक जीवन बीमा कंपनी से ली जा सकती है. आइए विकल्पों की समीक्षा करते हैं.

उल्टा गिरवी योजना या रिवर्स मॉर्गेज स्कीम (RMS) के तहत बुजुर्ग नागरिक अपने घर पर आय का अतिरिक्त स्रोत पा सकते हैं, वो भी अपने जीवनकाल में उसकी सर्विस कराए बिना. आरएमएस के तहत वरिष्ठ नागरिकों के पास दो विकल्प होते हैं. या तो वे बैंक से डायरेक्ट पेमेंट ले सकते हैं अथवा समय-समय पर. इसके अलावा वे जीवन बीमा कंपनी को कर्जदाता द्वारा भुगतान की गई एकमुश्त राशि की मदद से वार्षिकी खरीद सकते हैं. इस आर्टिकल में हम आपको दोनों विकल्पों में टैक्स के झमेलों के बारे में बताएंगे.

कर्जदाता से पैसे लेना:

टैक्स कानूनों के मुताबिक, कैपिटल असेट के ट्रांसफर पर कमाए गए मुनाफे को कैपिटल गेन्स माना जाता है, जिस पर टैक्स लगता है. इनकम टैक्स एक्ट, 1961 का सेक्शन 47 (16) प्रॉपर्टी के रिवर्स मॉर्गेज की इजाजत देता है, जिसे ट्रांसफर नहीं माना जाता. इसलिए प्रॉपर्टी को गिरवी रखते वक्त किसी तरह की टैक्स देयता नहीं होगी.

प्रॉपर्टी को गिरवी रखना ट्रांसफर नहीं माना जाएगा. लेकिन तब जरूर माना जाएगा अगर कर्जदाता या कानूनी वारिसों ने इसका निपटारा कर दिया. ऐसी स्थिति में तय अनुसार टैक्स लगाया जाएगा. अगर कर्जदाता प्रॉपर्टी बेच देता है तो कर्जदाता पर कैपिटल गेन्स लायबिलिटी का बोझ नहीं आएगा. अगर खरीददार जिंदा है तो उसे या फिर उसके कानूनी वारिसों को इसका भुगतान करना होगा. ध्यान रहे कि अगर खरीददार या उसके कानूनी वारिसों ने प्रॉपर्टी नहीं बेचने का फैसला किया है लेकिन वे अन्य स्रोतों से बकाया चुकाना चाहते हैं तो कोई टैक्स लायबिलिटी पैदा नहीं होगी क्योंकि संपत्ति की कर्जमुक्ति भी ट्रांसफर की राशि नहीं है.

जहां तक सामयिक (Periodical) या बैंक से एकमुश्त राशि का संबंध है, इनकम टैक्स कानून, 1961 के सेक्शन 10 (43) के मुताबिक कोई भी पैसा चाहे एकमुश्त हो या बैंक की इन्स्टॉलमेंट्स, उस पर टैक्स नहीं लगेगा. आरएमएस के तहत, प्रॉपर्टी का निपटारा होने तक कोई टैक्स के झमेले नहीं होते.

लाइफ इंश्योरेंस कंपनी से मिली वार्षिकी

बैंक से डायरेक्ट पेमेंट की जगह उधार लेने वाला शख्स कर्जदाता से योग्य रकम एक बार में लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को देने का अनुरोध कर सकता है. जब कंपनी समय-समय पर उधार लेने वाले को पैसा देने को राजी होती है तो उसे वार्षिकी कहा जाता है. यह उधार लेने वाले की पूरी जिंदगी के लिए हो सकता है जो RMS के तहत बैंक से सीधे भुगतान के लिए निर्धारित 20 साल की अवधि से अधिक हो सकता है.

ऐसे लेनदेन में कर्जदाता उधारलेने वाले को पैसा मुहैया कराता है लेकिन उसे लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को दे देता है. लिहाजा पैसे का लेनदेन कैपिटल गेन्स के मकसद के लिए ट्रांसफर नहीं माना जाता. लेकिन मिली हुई वार्षिकी का टैक्स ट्रीटमेंट बैंक से सीधे मिले भुगतान से अलग है. भारतीय टैक्स नियमों के मुताबिक सभी वार्षिकी ‘आय के अन्य स्रोत के तहत’ कर योग्य हैं. साल 2013 में आरएमएस में कुछ बदलाव किए गए, ताकि योजना के तहत जीवन बीमा कंपनियों को एकमुश्त भुगतान का प्रावधान हो सके. हालांकि, धारा 10 (43) में जीवन बीमा कंपनियों को छूट के रूप में वार्षिकी पाने के लिए संबंधित संशोधन नहीं किए गए थे, जिससे उन पर टैक्स लगना जारी है. मौजूदा टैक्स कानूनों में यह साफ हो गया है कि वार्षिकी हासिल करने के विकल्प की तुलना में कर्जदाता से डायरेक्ट भुगतान पाने का विकल्प ज्यादा बेहतर है. हालांकि, बाद वाले विकल्प में आप जीवनभर पेमेंट्स हासिल कर सकते हैं. यह विकल्प कर्जदाता से सीधे पेमेंट में उपलब्ध नहीं है.

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