पैतृक संपत्ति को बेचने के मामले में क्या हैं पिता के अधिकार


क्या पिता किसी पैतृक संपत्ति को घर के अन्य सदस्यों की मंजूरी के बिना बेच सकता है? आज हम सवालों के जवाब जानने के लिए कर्ता बनाम सहयादिक के अधिकारों का कोर्ट के आदेशों के मुताबिक विश्लेषण करेंगे.

अपने पिता, दादा या परदादा को छोड़कर किसी हिंदू द्वारा खुद अर्जित या किसी से विरासत में मिली संपत्ति को व्यक्तिगत संपत्ति माना जाता है. जहां तक व्यक्तिगत संपत्ति का सवाल है, तो आप इसे बेचने के हकदार हैं, जिस तरह से आप चाहते हैं और आपको अपने माता-पिता या बच्चों सहित किसी से सहमति लेने की जरूरत नहीं है.

हिंदुओं में पैतृक और संपत्ति के व्यक्तिगत स्वामित्व की एक अजीब अवधारणा है. हालांकि वे भारत में संपत्ति के स्वामित्व और उत्तराधिकार के मकसद से हिंदू धर्म का पालन नहीं करते हैं, जैन, सिख और बौद्धों को भी हिंदू माना जाता है.

 

हिंदू गैर-विभाजित परिवार (HUF) और पैतृक संपत्ति की अवधारणा

पैतृक संपत्ति वो होती है, जो एक हिंदू अपने पिता, दादा या परदादा से हासिल करता है. ऐसी संपत्ति को पारिवारिक संपत्ति कहा जाता है और यह गैरविभाजित हिंदू परिवार (एचयूएफ) से संबंधित होती है.

विरासत में मिली संपत्ति के विषय में, जिसे एचयूएफ की संपत्ति माना जाता है, उसे बेचने के अधिकार को लेकर कुछ प्रतिबंध हैं. ऐसा नहीं है कि  पिता, जो एचयूएफ का कर्ता होता है, उसे हर बार प्रॉपर्टी डील करते वक्त बच्चों समेत परिवार के अन्य सदस्यों की मंजूरी लेनी पड़ती हो, जो पैतृक संपत्ति में हिस्से के हकदार हैं.

एचयूएफ का कर्ता होने के कारण पिता के पास पारिवारिक संपत्तियों को लेकर अतिरिक्त अधिकार होते हैं. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को पिता के अधिकारों पर फैसला देने का मौका मिला. इसमें पिता ने संपत्ति बेचते समय बेटे से मंजूरी नहीं ली थी. यह मामला था केहर सिंह बनाम नछित्तर कौर का, जिसका फैसला 20 अगस्त 2018 को आया था.

 

 

पैतृक संपत्ति को बेचने या विभाजित करने में सहदायिक और कर्ता के अधिकार

इस मामले में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने फैसला दिया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगाई थी. केहर सिंह ने साल 1960 में पैतृक संपत्ति कुछ बाहरियों को बेच दी थी. केहर सिंह के बेटे ने अपने पिता द्वारा बेची गई संपत्ति के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी. उन्होंने कहा कि चूंकि यह पारिवारिक संपत्ति थी और पिता ने उनकी मर्जी के बिना संपत्ति बेची है इसलिए यह अमान्य है.

यहां ध्यान दिलाया जा सकता है कि हिंदू कानून के तहत, सहदायिक केवल एचयूएफ संपत्ति के विभाजन के लिए पूछने के हकदार हैं. 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन होने तक, परिवार के केवल पुरुष सदस्यों को सहदायिक माना जाता था.

हालांकि, संशोधन के बाद, बेटों और बेटियों दोनों को एक समान माना गया है. अब, दोनों को सहदायिक के रूप में माना जाता है और इस तरह दोनों एचयूएफ संपत्ति के विभाजन के लिए पूछने के लिए समान रूप से हकदार हैं.

खरीदारों और केहर सिंह की ओर से यह दलील दी गई कि एचयूएफ के पिता और कर्ता होने के नाते, केहर सिंह के पास परिवार के अन्य सदस्यों की तुलना में संपत्ति के संबंध में अधिक अधिकार थे. एचयूएफ के कर्ता के पास कुछ परिस्थितियों में पारिवारिक संपत्ति को बेचने या सौदा करने के अधिकार होते हैं और उन्हें बेटों की सहमति लेने की भी जरूरत नहीं होती.

जिन परिस्थितियों में पिता पारिवारिक संपत्ति को बेच सकता है, उन पर चर्चा करते हुए, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने विभिन्न परिस्थितियों पर विचार किया था, जिसके तहत एचयूएफ के कर्ता बेटे की सहमति के बिना, परिवार की संपत्ति का निपटान कर सकते हैं.

 

वो परिस्थितियां जिनके तहत एक पिता पारिवारिक संपत्ति बेच सकता है

ऊपर बताए गए केस में फैसला देते समय पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने मुल्ला द्वारा ‘हिंदू लॉ’ के क्लासिक कार्य पर भरोसा किया. इस क्लासिक किताब में मुल्ला ने कहा कि हिंदू पिता के पास, कानूनी जरूरत में परिवार की संपत्ति को अलग करने की विशेष शक्तियां हैं, जो किसी अन्य सहदायिक के पास नहीं हैं. मुल्ला ने माना कि इस विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए पिता केवल कुछ विशेष घटनाओं के दौरान, जैसे परिवार के संकट और खासतौर पर अच्छे मकसदों के लिए परिवार की संपत्ति के एक हिस्से को तोहफा बना सकते हैं.

यह भी देखें: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के तहत एक हिंदू बेटी के संपत्ति में अधिकार

मुल्ला आगे कहता है कि पिता अपना या पैतृक कर्ज को चुकाने के लिए पैतृक संपत्ति को बेच या गिरवी रख सकता है. इसमें उसके बेटे, पोते और पड़पोते के शेयर शामिल हैं.
इसलिए कर्ज बिक्री या गिरवी के लेन-देन का हिस्सा नहीं होना चाहिए, लेकिन ये बिक्री या गिरवी के लेनदेन से पहले होना चाहिए था. अपने निजी कर्जों को चुकाने या सुरक्षित करने के लिए, पिता परिवार की संपत्ति को बेच या गिरवी रख सकता है बशर्ते दिया गया लोन किसी गलत या अवैध मकसद के लिए न हो.

 

क्या होती है कानूनी जरूरत?

कानूनी जरूरतों की व्याख्या करते हुए मुल्ला ने विभिन्न परिस्थितियों के बारे में बताया है.एक ही संपत्ति के संबंध में  टैक्स और कर्ज का भुगतान और साथ ही सहदायिक और परिवार के अन्य सदस्यों के रखरखाव के लिए किए गए खर्चों को कानूनी जरूरतों के रूप में माना जाता है. हिंदू कानून पर अपनी क्लासिक बुक में मुल्ला ने परिवार के सदस्यों के विवाह या अंतिम संस्कार के साथ-साथ परिवार के समारोहों के लिए किए गए खर्च भी कानूनी जरूरतों के दायरे में आते हैं.

कानूनी जरूरतों के रूप में किए गए खर्चों की सूची में परिवार की संपत्ति की रक्षा या किसी आपराधिक मुकदमे के खिलाफ परिवार के किसी सदस्य का बचाव करने के लिए किए गए सभी खर्च कानूनी जरूरतों में शामिल हैं. संपत्ति की बिक्री या गिरवी, परिवार के बिजनेस के लिए किए गए किसी भी लोन को चुकाने के लिए, कानूनी जरूरतें पैदा करती हैं. लेकिन अगर कर्ज पिता के अलावा अन्य शख्स का है वो इसलिए क्योंकि कर्ज पुराना है. लिहाजा इस तरह के कर्ज को चुकाने के लिए संपत्ति की कोई भी बिक्री परिवार की संपत्ति को बेचने और विस्थापित करने के लिए कर्ता के अधिकार के तहत नहीं आएगी.

 

मामले में क्या फैसला हुआ?

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में यह बात साबित हो गई थी कि  जमीन के टुकड़े की बिक्री पिता ने बिना बेटे से सहमति लिए की. वो इसलिए क्योंकि उसे परिवार का कर्ज चुकाना था और परिवार के स्वामित्व वाली जमीन पर कृषि गतिविधि के लिए पैसों की जरूरत थी. ये कानूनी जरूरतों के दायरे में आती हैं. इस फैसले से पैतृक संपत्ति के मामले में एचयूएफ के कर्ता के अधिकारों की सीमा/आजादी में काफी स्पष्टता आई.

(लेखक 35 वर्षों के अनुभव के साथ टैक्स और इन्वेस्टमेंट के एक्सपर्ट हैं)

 

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