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क्या है स्टाम्प पेपर? स्टाम्प पेपर की ज़रुरत कब-कब पड़ सकती है?

what is a stamp paper

हमारे देश में ज़मीन या समझौते से जुड़ा कोई भी छोटा-बड़ा कानूनी काम हो, कम ही मुमकिन है की वह बिना स्टाम्प पेपर के पूरा हो सके।  चाहे आप को रेंट एग्रीमेंट बनवाना हो या सेल डीड, चाहे पावर ऑफ़ अटॉर्नी या फिर गिफ्ट डीड, हर तरह के कागज़ात बनवाते हुए आपको स्टाम्प पेपर ख़रीदना ही पड़ता है।  इसलिए स्टाम्प पेपर  के बारे में एक बेसिक अंडरस्टैंडिंग हम सभी को होनी ही चाहिए।

 

क्या होता है स्टाम्प पेपर?

भले ही देखने में वह रुपये से एकदम अलग हो लेकिन आसान भाषा में कहें तो स्टाम्प पेपर भी एक तरह का रूपया ही है। एक नार्मल कागज़ जैसी दिखने वाली यह करेंसी कोई आम नहीं बल्कि एक ख़ास दस्तावेज़ है जिसका इस्तेमाल घर की खरीद से लेकर ज़मीन के बंटवारे तक हर कानूनी काम में होता है।

एक नार्मल नोट की तरह के एक स्टाम्प पेपर की वैल्यू भी उतनी ही होगी जितना मूल्य उस पर अंकित होगा। जैसे 10 रुपये के नोट कीमत 10 रूपया होती है, उसी तरह 10 रुपये के स्टाम्प की वैल्यू भी 10 रूपया ही होगी। 10 रुपये के नोट और 10 रुपये के स्टाम्प पेपर में फ़र्क़ यह है कि जहाँ 10 रुपये के नोट को आप किसी को भी दे कर उसकी कीमत वसूल कर सकते हैं, 10 रुपये के स्टाम्प के साथ आप ऐसा नहीं कर सकते। स्टाम्प पेपर करेंसी का वह प्रकार है जिसे जिसे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तान्तरित नही किया जा सकता है।

राजस्व विभाग द्वारा जारी किया जाने वाला यह पेपर रूपये की तरह कार्य करता है। इसका एक स्वीकृत वेंडर होता है जो स्टाम्प जारी समय स्टाम्प के पीछे क्रम संख्या, नाम, पिता का नाम, पता लिखकर अपने हस्ताक्षर कर देता है. जिस व्यक्ति के लिए स्टाम्प जारी किया गया है, केवल वही व्यक्ति उस स्टाम्प का उपयोग कर सकता है।

 

 

स्टाम्प के प्रकार

स्टाम्प के दो प्रकार होते हैं:

न्यायिक स्टाम्प (जुडिशल स्टाम्प)

सिविल मुकदमे को न्यायालय में लेकर जाने पर उसमें एक कोर्ट फीस अदा करनी होती है। ऐसी कोर्ट फीस, कोर्ट फीस अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित किए गए प्रतिशत के अनुसार अदा करनी होती है। उस कोर्ट फीस में लगने वाले स्टाम्प को न्यायिक स्टाम्प कहा जाता है।

गैर-न्यायिक स्टाम्प (नॉन-जुडिशल स्टाम्प)

ऐसा स्टाम्प भी होता है जिस पर विशेष रूप से यह टीप डालनी होती है कि यह गैर-न्यायिक स्टाम्प है. अर्थात, इस स्टाम्प को किसी भी कोर्ट फीस के मामले में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

इस स्टाम्प को कोई हस्तांतरण के उद्देश्य से बनाए गए लेख में इस्तेमाल किया जा सकता है या फिर किसी शपथ पत्र में इस्तेमाल किया जा सकता है। पर किसी न्यायालय में इसे कोर्ट फीस के रूप में नहीं दिया जा सकता।

आम तौर पर लोगों को एक गैर-न्यायिक स्टाम्प की ही आवश्यकता होती है क्योंकि कोर्ट फीस, इत्यादि, भरने का कार्य तो वकीलगण करते हैं।

 

कितने से कितने तक होती है स्टाम्प पेपर की कीमत?

स्टाम्प पेपर की अलग-अलग कीमत होती है. छोटे से लेकर बड़े सभी स्टाम्प होते है. एक रूपये का राजस्व टिकट भी स्टाम्प कहा जाता है उसकी भी हैसियत इसी प्रकार होती है जिस प्रकार 100 रूपये के स्टाम्प की होती है।

 

स्टाम्प पेपर संबंधित कानून

स्टाम्प पेपर को नियमित करने के लिए एक अधिनियम बनाया गया है जिसे भारतीय स्टाम्प अधिधियम, 1899, कहा जाता है,  जिसे 1 अप्रैल, 1899 को भारत संसद द्वारा कानूनी रूप से अधिनियमित किया गया था। यह अधिनियम विभिन्न कानूनी और वित्तीय दस्तावेजों पर स्टांप शुल्क के भुगतान को विनियमित करने, उनकी वैधता और प्रवर्तनीयता सुनिश्चित करने का कार्य करता है। यह अधिनियम स्टाम्प से सम्बन्धित प्रक्रिया को निर्धारित करता है।

 

स्टाम्प पेपर की ज़रुरत क्यों और कब पड़ती है?

जब भी दो व्यक्ति आपस में किसी भी प्रकार का क्रय-विक्रय करते हैं तब उसमें सरकार का भी एक हिस्सा होता है. उस हिस्से को हम टैक्स कह सकते हैं। किसी चल व अचल संपत्ति को खरीदते समय या उससे संबंधित कोई भी हस्तांतरण करते समय हमें सरकार को कोई न कोई धनराशि अदा करनी होती है।

जैसे की जब भी हम किसी भी प्रकार की सम्पत्ति का क्रय-विक्रत करते हैं तब हमे उस सम्पत्ति पर राजस्व विभाग को कर अदा करना पड़ता है. यह टैक्स हम स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्ज के रूप में सरकार को अदा करते हैं।

स्टाम्प पेपर की ज़रूरत प्रायः निन्मलिखित कानूनी दस्तावेज़ों को वैधता देने के लिए पड़ती है: 

 

ज़मीन और संपत्ति की खरीद और रजिस्ट्री में स्टाम्प पेपर का रोल

भारतीय कानून के हिसाब से किसी संपत्ति को जब खरीदा जाता है, तब उसकी रजिस्ट्री की जरूरत होती है. ऐसी रजिस्ट्री के लिए एक निर्धारित राशि के स्टाम्प की आवश्यकता होती है। भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम के अंतर्गत यह कहा गया है कि चल व अचल संपत्ति अगर Rs 100 से अधिक वैल्यू की है उसके रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता है।

मान लीजिए कि कोई मकान Rs 50 lakh में किसी व्यक्ति ने खरीदा है. ऐसी संपत्ति को रजिस्टर करवाना होगा। इसे रजिस्टर् करवाने के लिए एक विक्रय विलेख (sale deed) तैयार करनी होगी। रजिस्ट्रीकरण एक्ट के अंतर्गत ही यह भी बताया गया है कि कितने रुपए के स्टाम्प उस विक्रय पर लगाने होंगे।

 

ज़मीन, संपत्ति की खरीद में कैसे तय होती है स्टाम्प पेपर की कीमत?

सरकार विभिन्न फैक्टर्स को धयान में रखते हुए हर संपत्ति की एक कीमत तय करती है, जिसे सरकारी दिशा निर्देश कहा जाता है। अलग-अलग राज्यों में यह दिशा निर्देश रेट circle rate, ready reckoner rate, guidance rate आदि नामों

 

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