जानिए अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी के लिए कैसे कैलकुलेट होगा होल्डिंग पीरियड


किसी प्रॉपर्टी के होल्डिंग पीरियड की गणना कैसे होनी चाहिए? अलॉटमेंट की तारीख से दो वर्ष या जिस तारीख से पोजेशन लिया गया है उससे। आइए कोर्ट के दिए कुछ आदेश पर नजर डालते हैं।
लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स के साथ टैक्स छूट क्लेम करने के लिए किसी शख्स के लिए 24 महीने का होल्डिंग पीरियड काफी अहम होता है। लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स किसी संपत्ति विक्रेता को इंडेक्सेशन, 20 प्रतिशत की छूट और कैपिटल गेन्स बॉन्ड्स या किसी अन्य रिहायशी घर में निवेश कर टैक्स बचाने का रास्ता देता है। हालांकि जब बात किसी अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी के होल्डिंग पीरियड के कैलकुलेशन की हो तो इसमें काफी अस्पष्टता है। क्या होल्डिंग पीरियड प्रॉपर्टी बुक करने की तारीख से कैलकुलेट किया जाए या उसकी पोजेशन की तारीख से। चूंकि मौजूदा कानून इसका सटीक जवाब नहीं देते, इसलिए कोर्ट के कुछ आदेशों पर नजर डालते हैं। लेकिन स्थिति उस वक्त और जटिल हो जाती है, जब इसी मामले को लेकर फैसले भी विवादित होते हैं।

आइए दो एेसे ही विवादित फैसलों पर चर्चा करते हैं:

पहले फैसले में होल्डिंग पीरियड को अलॉटमेंट लेटर की तारीख से कैलकुलेट किया गया। विनोद कुमार जैन बनाम सीआईटी 344 आईटीआर 501 (पी एंड एच) के फैसले में पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) द्वारा जो फ्लैट्स अलॉट किए गए हैं, उनका होल्डिंग पीरियड अलॉटमेंट लेटर की तारीख से काउंट होना चाहिए। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स (सीबीडीटी) ने एक सर्कुलर (नंबर 471, डेट 15 अक्टूबर 1986) जारी किया था, जिसमें उन्होंने साफ किया था कि डीडीए की सेल्फ फाइनेंसिंग स्कीम में होल्डिंग पीरियड अलॉटमेंट लेटर की तारीख से शुरू होगा।
हालांकि बंबई हाई कोर्ट ने सीआईटी बनाम डॉ डीए ईरानी डॉ बीपी सराफ और एवाई सखारे, जेजे आईटी संदर्भ संख्या 112 1987 सितंबर 15, 1998 को लेकर कहा कि फ्लैट किरायेदारी अधिकारों के बदले आवंटित किया गया है, लिहाजा फ्लैट का होल्डिंग पीरियड उसकी पोजेशन की तारीख से शुरू होना चाहिए और प्रॉपर्टी में किरायेदारी अधिकारों के होल्डिंग पीरियड को नजरअंदाज करना चाहिए।
इसके अलावा बंबई ट्रिब्यूनल ने 19 अप्रैल 2012 को जयमल के शाह, मुंबई बनाम आयकर विभाग मामले में कहा कि अलॉटमेंट लेटर या अग्रीमेंट टू सेल के तहत बिल्डर के पास बुक किया गया एक निर्माणाधीन फ्लैट सिर्फ उसे हासिल करने का अधिकार दर्शाता है और यदि 36 महीने से अधिक की होल्डिंग अवधि के बाद ऐसा अधिकार बेचा जाता है तो यह एक लॉन्ग टर्म कैपिटल असेट बन जाता है। लेकिन जब फ्लैट की पोजेशन ली जाती है तो होल्डिंग पीरियड एक बार फिर पोजेशन की तारीख से शुरू होता है।
(NOTE: 2017 के बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने प्रॉपर्टीज के लिए होल्डिंग पीरियड 3 साल से घटाकर 2 साल करने का एेलान किया था।)

तो टैक्सपेयर्स को क्या करना चाहिए:

अगर हाई कोर्ट का फैसला आपके हक में नहीं है तो दोनों मामलों को अलग-अलग रूप में देखें। अगर 24 महीने की अवधि खत्म हो चुकी है और आप फ्लैट बेचना चाहते हैं तो पोजेशन लेने से पहले ही यह कर लें। पंजाब और हरियाणा के मामलों में भी (जहां डीडीए के तहत आवंटित फ्लैटों की योजना असाधारण है और मालिक को सेल्फ फाइनेंसिंग स्कीम के तहत फ्लैट का मालिक माना जाता है) आपके बिल्डर के नियम व शर्तें डीडीए की स्कीम से अलग हो सकती हैं, लिहाजा मालिक को जरूरत से ज्यादा सतर्क होना पड़ेगा। लेकिन अगर आपका मामला मिलता जुलता या एक जैसा है तो आप रिस्क ले सकते हैं।
इसलिए अगर आपने अंडर कंस्ट्रक्शन में फ्लैट बुक किया है व उसे बेचना चाहते हैं और 24 महीने बीत चुके हैं तो पोजेशन लेने से पहले ही यह कर लें। वरना कानूनी पचड़े में आपके काफी पैसे खर्च हो सकते हैं। लेकिन अगर फैसला पहले से ही लिया जा चुका है, तो स्थिति को बचाने के लिए ऊपर बताए गए अदालत के फैसले के तहत आश्रय लिया जा सकता है।
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