बेहतर रोजगार संभावनाओं और शैक्षिक अवसरों के कारण लोग नए स्थानों पर जाने लगते हैं। नए शहर में जाने पर सबसे पहले सुरक्षित आवास पर विचार करना जरूरी होता है। भारत में आवास क्षेत्र समाज के विभिन्न वर्गों की विविध आवासीय आवश्यकताओं को पूरा करता है। इसमें बंगले या विला जैसे लग्जरी आवास विकल्प, अधिकांश शहरी आबादी के लिए गेटेड परियोजनाओं में आधुनिक अपार्टमेंट और विभिन्न ग्रामीण आवास योजनाएं शामिल हैं।
इसके अलावा, किराये का बाजार लगातार बढ़ती आवासीय मांग को पूरा करता है और साथ ही उन लोगों को सुविधा प्रदान करता है जो संपत्ति खरीदने में सक्षम नहीं हैं। इनके अलावा, को-लिविंग स्पेस जैसे उभरते निवेश विकल्प हैं जो बहुत सारे निवेशकों को आकर्षित करते हैं। हालाँकि, भारत में घर की कीमतों और किराए की दरों में लगातार वृद्धि के कारण, घर की तलाश करने वाले अक्सर यह तय नहीं कर पाते कि किराए पर रहें या किफायती आवास में निवेश करें।
किफायती आवास क्या है?
घर खरीदना अधिकांश भारतीयों का एक प्रमुख वित्तीय लक्ष्य होता है। लेकिन बढ़ती महंगाई, संपत्तियों की ऊंची कीमतें और होम लोन की अधिक ब्याज दरें घर खरीदना कठिन बना देती हैं। ‘किफायती आवास’ का अर्थ अलग-अलग लोगों के लिए अलग हो सकता है। सामान्य तौर पर, किफायती आवास उन आवासीय संपत्तियों को कहा जाता है, जो मध्यम आय से कम आय वाले परिवारों के बजट में शामिल हो सकें। किसी परिवार की खर्च योग्य आय उसकी वहन क्षमता तय करने का मुख्य आधार होती है। भारत में किफायती आवास मुख्य रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और निम्न तथा मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए है।
किफायती आवास की परिभाषा क्षेत्र के अनुसार बदलती है। मेट्रो शहरों में 65 लाख रुपये तक की कीमत वाले घरों को किफायती माना जाता है, जबकि टियर-2 और टियर-3 शहरों में 45 लाख रुपये तक की कीमत वाले घर इस श्रेणी में आते हैं।
किफायती आवास के फायदे
किफायती आवास निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए काफी लाभकारी हो सकता है, क्योंकि इससे वे अपनी आर्थिक स्थिति पर अत्यधिक दबाव डाले बिना घर खरीदने का सपना पूरा कर सकते हैं। बेहतर आवास सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देता है और जीवन स्तर सुधारता है। इससे आर्थिक स्थिरता बढ़ती है और वित्तीय संकट के जोखिम कम होते हैं।
संपत्ति खरीदने का एक बड़ा फायदा संपत्ति निर्माण और वित्तीय सुरक्षा है। रियल एस्टेट को सबसे सुरक्षित निवेश विकल्पों में से एक माना जाता है। समय के साथ संपत्तियों की कीमत बढ़ती है, जिससे निवेशक को बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना रहती है।
किफायती आवास को बढ़ावा देने के लिए सरकार की पहल
भारत सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) जैसी योजनाओं के जरिए लोगों को किफायती आवास उपलब्ध कराने के प्रयास कर रही है। इसके अलावा, ब्याज सब्सिडी योजना (ISS) जैसी योजनाओं के तहत पात्र उधारकर्ताओं को होम लोन के ब्याज पर सब्सिडी मिलती है।
किफायती आवास में निवेश करने पर कई कर लाभ भी उपलब्ध हैं। आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत होम लोन के मूलधन भुगतान पर सालाना 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट मिलती है। वहीं, पहली बार घर खरीदने वाले लोग धारा 80EE के तहत सालाना 50,000 रुपये तक अतिरिक्त कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
भारत में किराये का बाजार
हाल के वर्षों में भारत का किराये का आवास बाजार तेजी से बढ़ा है। इसके प्रमुख कारण हैं:
- अर्थव्यवस्था का विस्तार और प्रमुख शहरों में रोजगार के अवसर बढ़ना, जिससे अन्य शहरों में पेशेवरों का आवागमन बढ़ा है।
- बदलती जीवनशैली, कुछ लोग लंबी अवधि के निवेश की तुलना में किराए पर रहना अधिक सुविधाजनक मानते हैं।
- शहरी क्षेत्रों में ऊंची संपत्ति कीमतें, जो किराए को व्यावहारिक विकल्प बनाती हैं।
- मॉडल टेनेंसी एक्ट जैसे कानूनों के जरिए सरकार का किराये के बाजार को व्यवस्थित करने का प्रयास।
किराए पर रहने के फायदे
कई लोगों के लिए किराए पर रहना बेहतर विकल्प हो सकता है, क्योंकि:
- नौकरीपेशा लोगों के लिए स्थान बदलना आसान होता है।
- संपत्ति खरीदने की तुलना में शुरुआती खर्च कम होते हैं।
- रखरखाव, मरम्मत और संपत्ति कर जैसी जिम्मेदारियों से राहत मिलती है।
किफायती आवास बनाम किराया: लागत तुलना
किफायती आवास खरीदने में होने वाले खर्च
संपत्ति खरीदना एक जटिल प्रक्रिया है, क्योंकि इसमें कई छिपे हुए खर्च शामिल होते हैं। संपत्ति की कीमत के अलावा निम्नलिखित खर्च भी होते हैं:
- होम लोन प्रोसेसिंग फीस
- ईएमआई भुगतान
- जीएसटी शुल्क
- स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन शुल्क
- ब्रोकरेज शुल्क
- प्रॉपर्टी वैल्यूएशन और कानूनी शुल्क
- पार्किंग और मेंटेनेंस चार्ज
- लोकेशन प्रेफरेंस चार्ज
- शिफ्टिंग खर्च
- इंटीरियर डिजाइन और अन्य खर्च
ध्यान देने वाली बात यह है कि बैंक संपत्ति की पूरी कीमत के लिए लोन नहीं देते। आमतौर पर 80% से 90% तक का ही लोन मिलता है। बाकी राशि डाउन पेमेंट के रूप में खरीदार को खुद देनी पड़ती है। हालांकि, सरकार की किफायती आवास योजनाओं के तहत कुछ खरीदारों को केवल 5% से 10% डाउन पेमेंट पर भी लोन मिल सकता है।
निवेश पर रिटर्न (ROI) की गणना
निवेश पर रिटर्न (ROI) संपत्ति खरीदते समय एक महत्वपूर्ण पहलू है।
ROI = (निवेश का वर्तमान मूल्य – निवेश की लागत) ÷ निवेश की लागत × 100
ROI की गणना से खरीदार यह समझ सकते हैं कि कौन-सा निवेश अधिक लाभदायक हो सकता है।
भारत में किराए पर घर लेने के खर्च
किराए पर घर लेने में भी कई छिपे हुए खर्च शामिल होते हैं। मासिक किराए के अलावा:
- सिक्योरिटी डिपॉजिट
- ब्रोकरेज फीस
- शिफ्टिंग और इंटीरियर खर्च
- बिजली, पानी, गैस, टेलीफोन आदि के बिल
- पार्किंग और मेंटेनेंस शुल्क
- छोटी-मोटी मरम्मत संबंधी खर्च
किराए की दरें कई कारकों पर निर्भर करती हैं। शहर के केंद्र, बिजनेस हब या शैक्षणिक संस्थानों के पास स्थित संपत्तियों का किराया अधिक होता है। मांग और आपूर्ति का संतुलन भी किराए को प्रभावित करता है। इसके अलावा, सामाजिक बुनियादी सुविधाएं, प्रॉपर्टी की सुविधाएं, उसकी उम्र और प्रकार भी किराए की दर तय करते हैं।
संभावित किरायेदार बाजार की स्थिति समझने के लिए किसी ब्रोकर की मदद ले सकते हैं। घर खरीदने और किराए पर लेने से जुड़े सभी खर्चों की तुलना करना सही निर्णय लेने के लिए जरूरी है।
हाउसिंग डॉट कॉम न्यूज़ व्यूपॉइंट
घर खरीदना और किराए पर रहना — दोनों के अपने फायदे हैं। निर्णय लेते समय व्यक्ति को अपनी वित्तीय स्थिति, आय, नौकरी की स्थिरता और परिवार की जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए।
घर खरीदने और किराए पर रहने दोनों में लंबी अवधि के खर्चों की योजना बनाना जरूरी है। साथ ही, उन एकमुश्त खर्चों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, जो घर खरीदने या किराए पर लेने के दौरान आते हैं।
यदि आप किफायती आवास योजना में निवेश कर रहे हैं, तो पहले अपनी भुगतान क्षमता का आकलन जरूर करें। बेहतर होगा कि निवेश से पहले किसी वित्तीय विशेषज्ञ से सलाह लें।
FAQs
क्या लंबी अवधि में किफायती आवास खरीदना किराए पर रहने से बेहतर है?
लंबी अवधि में किफायती आवास में निवेश को किराए पर रहने की तुलना में अधिक लाभदायक माना जा सकता है, क्योंकि इससे संपत्ति निर्माण में मदद मिलती है और बेहतर रिटर्न मिल सकता है।
किफायती आवास में निवेश करने के क्या जोखिम या चुनौतियां हैं?
किफायती आवास में निवेश करने वालों के लिए निर्माण गुणवत्ता, दूरदराज क्षेत्रों में सीमित रीसेल अवसर, खराब कनेक्टिविटी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और प्रोजेक्ट में देरी जैसी चुनौतियां हो सकती हैं।






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