मकान किराए पर देते समय मकान मालिकों को किन गलतियों से बचना चाहिए?

किराएदारों की जांच-पड़ताल को नजरअंदाज करना और रखरखाव की लागत को कम आंकना मकान मालिकों द्वारा की जाने वाली सबसे आम गलतियों में शामिल है।

किसी संपत्ति को किराए पर देना एक समझदारी भरा कदम माना जाता है, क्योंकि इससे संपत्ति मालिकों को अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर मिलता है। हालांकि, हर मकान मालिक की कुछ जिम्मेदारियां होती हैं, जिन्हें निभाना जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किराएदार चुनने से पहले मकान मालिकों को कुछ जरूरी तैयारियां और एक चेकलिस्ट तैयार रखनी चाहिए। उचित योजना के अभाव में कई मकान मालिक ऐसी गंभीर गलतियां कर बैठते हैं, जो आगे चलकर कानूनी या वित्तीय समस्याओं का कारण बन सकती हैं। आइए जानते हैं ऐसी आम गलतियों के बारे में, जिनसे घर किराए पर देते समय बचना चाहिए।

#1. किराएदार की जांच-पड़ताल न करना

संपत्ति खरीदना जीवन का एक बड़ा निवेश होता है और उसे अविश्वसनीय किराएदारों को देना कई समस्याओं को जन्म दे सकता है, जैसे किराया न मिलना, संपत्ति को नुकसान, कानूनी विवाद आदि। इसलिए किराएदार की सही तरीके से जांच करना बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे संभावित जोखिमों और चेतावनी संकेतों की पहचान करने में मदद मिलती है। हालांकि, भारत में कई मकान मालिक संभावित किराएदारों की पृष्ठभूमि जांच नहीं करते। अक्सर किराएदार का चयन केवल उसके व्यक्तित्व, किसी मित्र की सिफारिश या घर देखने के दौरान हुई सामान्य बातचीत के आधार पर कर लिया जाता है।

कई शहरों में किराएदार का पुलिस वेरिफिकेशन करवाना अनिवार्य होता है, ताकि उसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके और भविष्य के विवादों से बचा जा सके। इसके अलावा, संभावित किराएदार से रेंट एप्लिकेशन फॉर्म भरवाना भी जरूरी है, जिसमें उसकी नौकरी, पिछला किराए का इतिहास और पूर्व निवास की जानकारी शामिल हो। यदि संभव हो, तो मकान मालिक पुराने मकान मालिकों के संपर्क विवरण लेकर उनसे बातचीत भी कर सकते हैं।

#2. स्पष्ट रेंट एग्रीमेंट न होना

संपत्ति किराए पर देते समय मकान मालिक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एक उचित रेंट एग्रीमेंट तैयार किया जाए और यदि किरायेदारी की अवधि 11 महीने से अधिक हो, तो उसका रजिस्ट्रेशन भी कराया जाए। आमतौर पर रेंट एग्रीमेंट और रजिस्ट्रेशन का खर्च किराएदार उठाता है, हालांकि कई मामलों में मकान मालिक भी इसमें हिस्सा लेते हैं।

भारत में कई मकान मालिक केवल अस्पष्ट अनुबंध बनाकर या किराए, अवधि आदि पर मौखिक बातचीत करके संपत्ति किराए पर दे देते हैं। यहीं से समस्याएं शुरू होती हैं, क्योंकि किराएदार की जिम्मेदारियों का कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं होता। ऐसे में कुछ किराएदार इस स्थिति का फायदा उठाते हैं, जिसके कारण मकान मालिक को किराया न मिलने, संपत्ति को नुकसान पहुंचने या किराएदार के फरार होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

इसलिए मकान मालिकों को एक विस्तृत रेंट एग्रीमेंट तैयार करना चाहिए, जिसमें किराएदारी से जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलू शामिल हों। खासतौर पर इसमें किराया राशि, भुगतान का तरीका, ग्रेस पीरियड, सिक्योरिटी डिपॉजिट, किराया बढ़ोतरी और देरी से भुगतान पर लगने वाले जुर्माने जैसी शर्तें अवश्य होनी चाहिए। इसके अलावा, बेदखली, संपत्ति के उपयोग और सबलेटिंग (उप-किराएदारी) से संबंधित क्लॉज भी शामिल किए जाने चाहिए।

#3. नियमित रखरखाव की अनदेखी करना

मकान मालिक और किराएदार के बीच विवाद का एक प्रमुख कारण संपत्ति का उचित रखरखाव न होना है। चूंकि संपत्ति का मालिक मकान मालिक होता है, इसलिए मरम्मत और रखरखाव की जिम्मेदारी भी उसी की होती है। यदि संपत्ति की देखभाल नहीं की जाए, तो उसकी स्थिति खराब हो सकती है, संपत्ति का मूल्य घट सकता है और नए किराएदारों की रुचि भी कम हो सकती है।

इसलिए नियमित निरीक्षण और मरम्मत के लिए एक तय योजना बनाना जरूरी है। रखरखाव में देरी करने से भविष्य में भारी खर्च उठाना पड़ सकता है। मकान मालिक संपत्ति के निरीक्षण के लिए पेशेवर सेवाओं की मदद भी ले सकते हैं और जरूरी मरम्मत की पहचान कर सकते हैं।

#4. छिपे हुए खर्चों को नजरअंदाज करना

कई मकान मालिक, खासकर पहली बार संपत्ति किराए पर देने वाले, किराएदारी से जुड़े छिपे हुए खर्चों को नजरअंदाज कर देते हैं। किराए से आय तो होती है, लेकिन इसके साथ कई खर्चे भी जुड़े होते हैं। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा रखरखाव खर्च का होता है। यदि इन खर्चों का सही अनुमान न लगाया जाए, तो वित्तीय समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

घर की पेंटिंग, प्लंबिंग या लाइटिंग से जुड़ी मरम्मत के अलावा ब्रोकरेज शुल्क और होम स्टेजिंग जैसे खर्चे भी होते हैं। इसलिए उचित बजट योजना बनाना जरूरी है। किराया तय करने से पहले मकान मालिकों को सभी संभावित और अप्रत्याशित खर्चों का अनुमान लगा लेना चाहिए। साथ ही, बाजार की स्थिति, संपत्ति का प्रकार और उपलब्ध सुविधाओं जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।

#5. कानूनी जिम्मेदारियों को नजरअंदाज करना

भारत में किराएदारी से जुड़े कानून मकान मालिक और किराएदार दोनों के हितों की रक्षा करते हैं। राज्य-विशिष्ट रेंट कंट्रोल एक्ट और मॉडल टेनेंसी एक्ट महत्वपूर्ण कानून हैं। संपत्ति मालिकों को स्थानीय किराएदारी कानूनों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि वे बड़े कानूनी विवादों से बच सकें।

ये कानून मकान मालिक और किराएदार के बीच विवादों के समाधान के लिए एक औपचारिक व्यवस्था प्रदान करते हैं। इसके अलावा, मकान मालिकों को अपनी कानूनी जिम्मेदारियों, जैसे संपत्ति कर का भुगतान आदि, के प्रति भी जागरूक रहना चाहिए।

#6. अवास्तविक किराया तय करना

मकान मालिकों को संपत्ति का किराया बहुत अधिक या बहुत कम तय करने से बचना चाहिए। सही बाजार विश्लेषण के आधार पर उचित किराया तय करने से बेहतर रेंटल आय प्राप्त हो सकती है। इसके लिए वे पेशेवर प्रॉपर्टी वैल्यूएशन सेवाओं या स्थानीय ब्रोकर की मदद ले सकते हैं।

उन्हें यह समझना चाहिए कि किराया कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे संपत्ति में उपलब्ध सुविधाएं, सामाजिक बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता, परिवहन और कार्यस्थल से कनेक्टिविटी आदि।

#7. किराएदारों के साथ खराब संवाद

मकान मालिकों को अपने किराएदारों के साथ नियमित संपर्क बनाए रखना चाहिए, ताकि मकान मालिक-किराएदार संबंध अच्छे बने रहें। उचित संवाद की कमी से गलतफहमियां और अनसुलझी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

विशेष रूप से एनआरआई संपत्ति मालिकों को एक पेशेवर संचार माध्यम स्थापित करना चाहिए, यदि वे किसी अन्य शहर या देश में रहते हों। किराएदारों की समस्याओं का समय पर समाधान करने से विवाद कम होते हैं और लंबे समय तक किराएदारी बनी रहती है, जिससे निवेश पर बेहतर रिटर्न (ROI) मिलता है।

#8. प्रॉपर्टी इंश्योरेंस को नजरअंदाज करना

भारत में अब कई घर मालिक प्रॉपर्टी इंश्योरेंस के महत्व को समझने लगे हैं। होम इंश्योरेंस पॉलिसी चोरी, आग या प्राकृतिक या मानव-निर्मित आपदाओं के दौरान होने वाले संरचनात्मक नुकसान से सुरक्षा प्रदान करती है।

यदि संपत्ति बाढ़ या भूकंप जैसे जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित है, तो इंश्योरेंस पॉलिसी वित्तीय नुकसान से सुरक्षा देने में मदद करती है। इस प्रकार, किराए पर दी गई संपत्ति के लिए बीमा एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित होता है।

#9. दस्तावेजों का सही रखरखाव न करना

बिना उचित दस्तावेजों के संपत्ति किराए पर देना कानूनी समस्याएं पैदा कर सकता है। किराएदारी केवल मौखिक बातचीत पर आधारित नहीं होनी चाहिए। कई मकान मालिक औपचारिक रेंट एग्रीमेंट और अन्य जरूरी दस्तावेजों को नजरअंदाज कर देते हैं।

इसका नकारात्मक प्रभाव मकान मालिक पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भविष्य में संपत्ति खाली करवाना मुश्किल हो सकता है। दस्तावेजों की अनुपस्थिति में किराया बढ़ाने जैसे मामलों में भी मकान मालिक कमजोर स्थिति में आ सकता है।

इसलिए संपत्ति मालिकों को किराएदार से रेंट एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करवाकर उसका रजिस्ट्रेशन अवश्य कराना चाहिए। किसी भी विवाद की स्थिति में यह एक वैध कानूनी दस्तावेज के रूप में काम करेगा। इसके अलावा, किराए के भुगतान, रखरखाव खर्च और किराएदार के साथ हुए संवाद का रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखना चाहिए। वित्तीय और कर संबंधी दस्तावेजों का रखरखाव भी जरूरी है।

#10. बेदखली प्रक्रिया को गलत तरीके से संभालना

बेदखली प्रक्रिया में देरी करना भी एक बड़ी गलती है। यह समस्या खासतौर पर उन मकान मालिकों के लिए आम है, जो किसी दूसरे शहर में रहते हैं। यदि मकान मालिक को लगता है कि किराएदार परेशानी पैदा कर रहा है, तो उसे तुरंत कानूनी प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।

किराएदार को पर्याप्त समय देकर संपत्ति खाली करवाने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए। साथ ही, नुकसान से बचने के लिए नए किराएदार की तलाश भी शुरू कर देनी चाहिए।

गैरकानूनी तरीके से बेदखली करने पर मकान मालिक कानूनी परेशानी में पड़ सकता है। भारत में किराएदारी कानून किराएदारों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। किराएदार कोर्ट में जाकर स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 5 के तहत राहत मांग सकते हैं। इसके अलावा, वे रेंट कंट्रोलर और ट्रिब्यूनल का भी सहारा ले सकते हैं।

यदि किराएदार अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करता है और संपत्ति खाली करने से इनकार करता है, तो मकान मालिक को कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। सबसे पहले किराएदार को आधिकारिक नोटिस भेजना चाहिए। इसके बाद मकान मालिक रेंट अथॉरिटी में शिकायत दर्ज करा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर सिविल कोर्ट में बेदखली का मुकदमा दायर कर सकता है।

कठिन किराएदार को बेदखल करने के तरीके के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए क्लिक करें।

Housing.com व्यूपॉइंट

संपत्ति मालिक बेहतर रेंटल आय अर्जित करने के उद्देश्य से अपनी संपत्ति किराए पर देते हैं। निवेश पर रिटर्न (ROI) की गणना करते समय रखरखाव और मरम्मत जैसे परिचालन खर्चों को भी ध्यान में रखा जाता है। मकान मालिकों को उन सामान्य गलतियों से बचना चाहिए, जो उनके खर्च बढ़ाकर निवेश पर रिटर्न (ROI) को प्रभावित कर सकती हैं। बजट योजना के लिए वे किसी वित्तीय सलाहकार की मदद भी ले सकते हैं।

FAQs

एक अच्छे रेंट एग्रीमेंट में कौन-सी बातें शामिल होनी चाहिए?

एक रेंट एग्रीमेंट में किराए की शर्तें, भुगतान की तारीख, सिक्योरिटी डिपॉजिट का विवरण और संपत्ति के उपयोग एवं रखरखाव से संबंधित शर्तें शामिल होनी चाहिए।

घर किराए पर देते समय मकान मालिकों को सबसे आम कौन-सी गलती से बचना चाहिए?

किराएदार की सही जांच-पड़ताल न करना और रखरखाव खर्च का गलत अनुमान लगाना भारत में मकान मालिकों द्वारा की जाने वाली सबसे आम गलतियों में शामिल हैं।

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