जानिए कैसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स की टैक्स कैलकुलेशन पर इंडेक्सेशन असर डालता है?


2017 के बजट में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स की गणना के तरीके में काफी बदलाव प्रस्तावित किए गए थे. इसमें इंडेक्सेशन के बेस ईयर में बदलाव भी शामिल है. आज हम आपको बताएंगे कि प्रॉपर्टी की बिक्री पर यह लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स को कैसे प्रभावित करेगा.

मौजूदा टैक्स कानूनों के तहत, किसी शख्स द्वारा अचल संपत्ति बेचने पर होने वाले फायदे पर टैक्स लगाया जाता है. कैपिटल गेन्स की गणना के लिए अचल संपत्ति को होल्डिंग पीरियड के तहत दो कैटिगरी में बांटा गया है. अगर आपने किसी अचल संपत्ति का इस्तेमाल तीन या उससे कम साल के लिए किया है तो उसे शॉर्ट टर्म कैपिटल असेट माना जाएगा.

ऐसी अचल संपत्ति पर होने वाले फायदे को आपकी नियमित आय में जोड़ दिया जाता है और आप पर जो स्लैब पर लागू होता है, उसके तहत टैक्स लगता है. हालांकि, जिस अचल संपत्ति का इस्तेमाल आप तीन साल से ज्यादा समय के लिए करते हैं, उसे लॉन्ग टर्म असेट माना जाता है और ऐसी बिक्री पर फायदे पर 20 प्रतिशत सेस और सरचार्ज लगाया जाता है. इसके अलावा लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स बचाने के लिए एक टैक्सपेयर के पास किसी दूसरे रिहायशी घर या रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉरपोरेशन या नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया के कैपिटल गेन्स बॉन्ड्स में निवेश करने का विकल्प होता है. ऐसे कैपिटल असेट पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स सिर्फ नेट सेल प्राइज और कॉस्ट प्राइज के बीच का फर्क ही नहीं होता. कानून ने लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स की गणना के लिए एक विस्तृत तरीका तय किया है. बजट 2017 में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स की गणना के तरीके में कई बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं.

होल्डिंग पीरियड; मौजूदा और प्रस्तावित:

फिलहाल, कानून के मुताबिक टैक्स की रियायती दर का फायदा उठाने के साथ-साथ धारा 54, 54 एफ और 54 ईसी के तहत टैक्स का फायदा उठाने के लिए आपके पास अचल संपत्ति तीन से ज्यादा वर्ष तक होनी चाहिए. केंद्रीय बजट 2017-18 में होल्डिंग पीरियड 3 साल से घटाकर 2 साल करने का प्रस्ताव है.
अगर संपत्ति को 24 महीने से ज्यादा वक्त के लिए अपने पास रखा गया है तो रियायती टैक्स की दर, उपलब्ध छूट और इंडेक्सेशन का फायदा पाने के हकदार हैं. इसलिए जो भी अचल संपत्ति 1 अप्रैल 2017 के बाद ट्रांसफर की गई है तो उसे लॉन्ग टर्म माना जाएगा. लेकिन इस प्रावधान से इंडस्ट्री को फायदा नहीं होगा क्योंकि अचल संपत्तियों को इक्विटी शेयरों और डिबेंचर की तरह खरीदा या बेचा नहीं जाता. एक औसत निवेशक के पास एक से ज्यादा घर नहीं होते और वह अपने जीवनकाल में घर दो या तीन बार से ज्यादा नहीं बेचते.

लॉन्ग टर्म असेट पर इंडेक्सेशन के फायदे और प्रस्तावित बदलाव:

लॉन्ग टर्म कैपिटल असेट को रियायती कर पर फायदे एक से ज्यादा तरीके से मिलते हैं. लॉन्ग टर्म असेट के होल्डर के पास टैक्सेबल कैपिटल गेन्स की गणना के लिए असेट की लागत बढ़ाने का फायदा होता है. इसे आमतौर पर इंडेक्सेशन का फायदा कहा जाता है.

जो संपत्ति आप बेचना चाहते हैं, अगर वह 1 अप्रैल 1981 से पहले खरीदी गई है तो आपके पास कैपिटल गेन्स की गणना के लिए 1 अप्रैल 1981 की मार्केट वैल्यू इस्तेमाल करने का विकल्प है. अगर आपको अचल संपत्ति तोहफे या विरासत में मिली है तो मौजूदा कानून आपको उस व्यक्ति के लिए जिसने वास्तव में इसके लिए भुगतान किया था, के बजाय 1 अप्रैल 1981 को अचल संपत्ति का उचित बाजार मूल्य लेने की अनुमति देता है.

1 अप्रैल 1981 को किसी भी अचल संपत्ति के उचित बाजार मूल्य के लिए आपको एक पंजीकृत मूल्यांकनकर्ता से मूल्यांकन सर्टिफिकेट हासिल करना होगा. इसलिए अगर बेस ईयर 1981 है तो लागत इनफ्लेशन इंडेक्स (CII) की वैल्यू 100 है. पिछले साल महंगाई की दर को ध्यान में रखते हुए सरकार हर साल का मुद्रास्फीति सूचकांक जारी करती है. साल 2016-17 का सीआईआई 1125 था.

आइए इसे उदाहरण से समझते हैं. फर्ज कीजिए आपने 1965 में कोई प्रॉपर्टी 50 हजार रुपये में खरीदी है और दिसंबर 2016 में उसे 85 लाख में बेच दिया.1 अप्रैल 1981 को उस प्रॉपर्टी का उचित बाजार मूल्य 4 लाख था. इसलिए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स की गणना करने के लिए आपके पास 50,000 रुपये को 4 लाख रुपये में बदलने का विकल्प है. चालू वर्ष के लिए 1125 के CII के आधार पर संपत्ति की इंडेक्सेशन लागत 45 लाख रुपये होगी और आपका टैक्सेबल लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स 40 लाख रुपये. लिहाजा इस तरह आपने 84.50 रुपये का मुनाफा कमाया.

2017-18 के बजट में बेस ईयर 1981 की जगह 2001 करने का प्रस्ताव दिया गया है. यह एक शानदार प्रस्ताव है. क्योंकि यह खरीद की तारीख से लेकर 2001 तक प्रभावी रूप से आपकी अचल संपत्ति के मूल्य में इजाफा और उसे टैक्स फ्री करेगा. लिहाजा 1 अप्रैल 2001 को उचित बाजार मूल्य और आपकी लागत के रूप में चुना जा सकता है. 2001 के लिए इंडेक्स 100 होगा और कैपिटल गेन्स की गणना के लिए इसी प्रक्रिया को फॉलो किया जाएगा.

चूंकि संपत्ति में बढ़ोतरी का ऐतिहासिक डेटा सार्वजनिक तौर पर आसानी से उपलब्ध नहीं है, इसलिए अचल संपत्तियों के मालिकों को इसका फायदा मिलना आसान नहीं है. लेकिन, हम इन वर्षों में सीआईआई में इजाफे और देश में इक्विटी बाजार में कीमतों के सेंसेक्स बैरोमीटर में बढ़ोतरी की तुलना कर सकते हैं.

1981 के लिए 100 को बेस मानते हुए, CII ने सालाना आधार पर 6.95% महंगाई को ध्यान में रखा है. 1 अप्रैल 1981 को सेंसेक्स 173.79 था जो 10 फरवरी 2017 को 28,334 तक पहुंच गया, लिहाजा सालाना औसत दर 15.20 प्रतिशत हुई.

तो प्रभावी रूप से सीआईआई ने आपको फायदा पहुंचाया और आपकी कॉस्ट 7 प्रतिशत तक बढ़ा दी, जबकि इक्विटी के मामले में मूल्य में इजाफा 15 प्रतिशत है. अचल संपत्तियों के मूल्य में इजाफा इतना ज्यादा नहीं हो सकता लेकिन CII ने निश्चित रूप से सालभर के दौरान महंगाई के पूर्ण प्रभाव पर विचार नहीं किया है. फिर भी, यह प्रस्ताव अचल संपत्तियों के मालिकों के लिए टैक्स लायबिलिटी को काफी कम कर देगा, जिन्होंने 1 अप्रैल 2001 से पहले घर खरीदा था.

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