मकानमालिक की मौत के बाद संपत्ति कैसे होगी दूसरे के नाम, जानिए इससे जुड़ी हर जानकारी

वसीयत के जरिए अचल संपत्ति लोगों के नाम करना बेहद अहम है। लेकिन अगर वसीयत न हो तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत आप क्या कर सकते हैं, इसी बारे में आज हम आपको बता रहे हैं।
कड़ी मेहनत से बनाई गई संपत्ति सही लोगों तक पहुंचे, इसके लिए अच्छे उत्तराधिकारी की प्लानिंग बेहद जरूरी है। अचल संपत्ति के मामले में यह और भी जरूरी है, क्योंकि एेसी संपत्तियों की कानूनी उत्तराधिकार प्रक्रिया आसान नहीं होती। उदाहरण के तौर पर जो लोग फ्लैट्स में रहते हैं, उन पर राज्य के सहकारी कानून लागू होते हैं, जो मौत के  मामले में घर का नॉमिनेशन मुहैया करते हैं।
ध्यान देने वाली बात है कि नॉमिनेशन सिर्फ हाउसिंग सोसाइटी के रिकॉर्ड्स में नाम ही ट्रांसफर करता है। इससे नॉमिनी फ्लैट का मालिक नहीं बन जाता।
कानूनी वारिस संपत्ति के लाभकारी मालिक हैं और नामांकित शख्स अपने फायदे के लिए परिसंपत्ति का निपटान नहीं कर सकता। संपत्ति उत्तराधिकार कानून इस बात पर निर्भर करता है कि मृत शख्स ने वसीयत तैयार कराई है या नहीं। हिंदू (जिसमें बौद्ध, जैन और सिख भी आते हैं) हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत आते हैं जबकि भारत की बाकी जनसंख्या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत।

वसीयत के जरिए उत्तराधिकार:

जो लोग हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, वे अपनी संपत्ति वसीयत के जरिए किसी भी शख्स या रिश्तेदार को दे सकते हैं। एेसे मामले में मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में संपत्ति की वसीयत करने वाले के लिए यह अनिवार्य है कि वह कोर्ट से प्रोबेट (सर्टिफिकेशन) हासिल कर ले।

वसीयत न हो तो:

अगर कोई शख्स बिना वसीयत छोड़े ही मर गया है तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के तहत एक निर्धारित आदेश के तहत कानूनी वारिसों को संपत्ति दी जाएगी। पहली प्राथमिकता क्लास-1 कानूनी उत्तराधिकारियों को दी जाएगी, जिसमें करीबी रिश्तेदार जैसे माता-पिता, पत्नी, बच्चे और उनके बच्चे आते हैं। जब बात उनके हिस्से की आती है तो बेटे-बेटियों और माता-पिता को बराबर का हिस्सा मिलता है। पत्नी को भी एक हिस्सा दिया जाता है। हालांकि अगर एक से अधिक पत्नियां जिंदा हैं तो उन्हें भी एक हिस्सा मिलेगा, जिसकी वे हकदार होंगी। उनके उत्तराधिकारियों को भी एक हिस्सा मिलेगा, जिसके द्वारा और जिसके लिए वे दावा करेंगे।
जब भी कोई घर बिना वसीयत के होता है तो महिला वारिस एक हिस्से का दावा करने और घर में रहने की हकदार है। हालांकि सिर्फ पुरुष वारिसों को ही संपत्ति बांटने का अधिकार है। महिला वारिस बंटवारे की पहल नहीं कर सकती। वसीयत छोड़े जाने के बावजूद कानूनी वारिसों के लिए कोर्ट से उत्तराधिकार सर्टिफिकेट पाना बेहद जरूरी है। यह एक कानूनी दस्तावेज है तो उसे हासिल करने वाले लोगों को मृत शख्स का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार देता है। इसके जरिए वे उस शख्स के उधार जमा कर सकते हैं व सिक्योरिटी हासिल करने के अलावा बकाया भी चुका सकते हैं। उत्तराधिकार सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए मजिस्ट्रेट या हाई कोर्ट को एक एप्लिकेशन देनी होती है।  यह साफ है कि वसीयत होने से काफी परेशानियां दूर हो जाती हैं और प्रॉपर्टी सही लोगों के हाथ पहुंच जाती है।

 

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