एनआरआई भारत में अचल संपत्ति को विरासत में कैसे हासिल कर सकते हैं, जानिए क्या कहता है कानून


फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (FEMA) के प्रावधान और इनकम टैक्स कानून एनआरआई (प्रवासी भारतीय) या भारतीय मूल के लोग (पीआईओ) द्वारा अचल संपत्ति की विरासत और उसके लगातार मालिकाना हक पर लागू होते हैं.

प्रवासी भारतीय को किस तरह की संपत्तियां भारत में विरासत में मिलती हैं?

प्रवासी भारतीय (एनआरआई) या भारतीय मूल के लोग (पीआईओ) किसी भी अचल संपत्ति को विरासत के तौर पर हासिल कर सकते हैं चाहे वह रिहायशी हो कमर्शियल. वह किसी कृषि भूमि या फार्महाउस भी हासिल कर सकते हैं, जिसे वे खरीदने के हकदार नहीं हैं. प्रवासी भारतीय कहीं से भी प्रॉपर्टी विरासत में पा सकते हैं, अपने रिश्तेदारों से भी. एनआरआई या पीआईओ भारत में किसी दूसरे प्रवासी भारतीय या पीआईओ से संपत्ति विरासत में ले सकता है, लेकिन इसमें कुछ शर्तें लागू होती हैं. अगर उत्तराधिकार एक विदेशी नागरिक के हक में है, जो भारत से बाहर का निवासी है तो ऐसे में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई की इजाजत लेनी जरूरी है.
यह ध्यान रखना जरूरी है कि जिस शख्स से प्रवासी भारतीय को संपत्ति विरासत में मिली है, उसे उस अवधि में फॉरेन करंसी से संबंधित कानून के प्रावधानों के मुताबिक संपत्ति का अधिग्रहण करना होगा. इसलिए अगर आरबीआई से इजाजत नहीं ली गई तो एनआरआई या पीआईओ संपत्ति को हासिल नहीं कर पाएंगे.

संपत्ति की वारिसी के वक्त टैक्स भार: चूंकि एस्टेट ड्यूटी बहुत पहले ही खत्म की जा चुकी है इसलिए वारिसी के वक्त टैक्स का बोझ नहीं पड़ेगा. न तो मरने वाले प्रतिनिधि और न ही वारिस पर टैक्स का कोई भार पड़ेगा. अगर वही संपत्ति किसी शख्स ने अपने जीते जी बतौर गिफ्ट ट्रांसफर की हो और उस प्रॉपर्टी की वैल्यू 50 हजार रुपये से ज्यादा हो तो ग्रहण करने वाले को अपनी कुल आय में संपत्ति की मार्केट वैल्यू भी शामिल करनी होगी. ऐसा तब होगा जब वह डोनर का कोई खास रिश्तेदार न हो.
विरासत में मिली प्रॉपर्टी के निरंतर मालिकाना हक पर टैक्स का बोझ: एनआरआई या पीआईओ संपत्ति का मालिकाना हक बनाए रख सकते हैं या इसका निपटारा कर सकते हैं. अगर एनआईआर ने प्रॉपर्टी के निपटारे का फैसला कर लिया है तो जिस दौरान उसने संपत्ति का मालिकाना हक बरकरार रखा है, उस अवधि में कुछ टैक्स के झमेले सामने आएंगे. चूंकि भारत में वैल्थ टैक्स खत्म हो गया है लिहाजा अचल संपत्ति का मालिक होते हुए एनआरआई को कोई वैल्थ टैक्स के उलझनों में फंसना नहीं पड़ेगा.
अगर एनआरआई भारत में रहने के आधार पर आयकर कानूनों के मकसद के लिए प्रवासी है तो उसे भारत में विरासत में मिली संपत्ति से होने वाली इनकम की पेशकश करनी होगी. अगर प्रवासी भारतीय विरासत में मिली संपत्ति को अपने भारत दौरे के लिए खाली छोड़ना चाहता है तो ऐसी प्रॉपर्टी को कराधान के लिए इनकम की पेशकश करने की जरूरत नहीं है. लेकिन अगर उसके पास एक से ज्यादा घर हैं, जिसमें से एक विरासत में मिली संपत्ति भी है और वह उन्हें खाली रखता है. ऐसे में उसे एक प्रॉपर्टी खुद के रहने के लिए दिखानी होगी और अन्य प्रॉपर्टीज पर किराये की आय की पेशकश करनी होगी. किराये की राशि इस पर निर्भर करेगी कि प्रॉपर्टी मार्केट में कितने पैसे में उठ सकती है. अगर एनआरआई की सभी स्रोतों, जिसमें किराया या असाधारण किराये की आय बुनियादी छूट की सीमा को पार कर जाती है तो उसे भारत में इनकम टैक्स फाइल करना होगा.
संपत्ति की बिक्री या तोहफे के समय कराधान: कोई एनआरआई या तो विरासत में मिली संपत्ति को तोहफे में दे सकता है या उसे बेचकर पैसा भारत से बाहर भेज सकता है. लेकिन एनआरआई द्वारा प्रॉपर्टी गिफ्ट में देने पर कुछ पाबंदियां हैं. एनआरआई विरासत में मिली संपत्ति को ऐसे शख्स को दे सकता है जो भारत का नागरिक हो, एनआरआई हो या पीआईओ. वह इनके अलावा किसी अन्य शख्स को प्रॉपर्टी गिफ्ट नहीं कर सकता. अगर किसी ऐसे शख्स को प्रॉपर्टी गिफ्ट की जा रही है जो रिश्तेदार नहीं है तो संपत्ति हासिल करने वाले को प्रॉपर्टी की मार्केट वैल्यू पर टैक्स देना होगा.
अगर कोई एनआरआई या पीओआई प्रॉपर्टी किसी दूसरे एनआरआई या पीआईओ को प्रॉपर्टी बेचना चाहते है तो पहले उसे आरबीआई से परमिशन लेनी होगी. इसी तरह अगर एनआरआई विरासत में मिली कृषि भूमि, वृक्षारोपण भूमि या फार्महाउस को बेचना चाहता है वो वह किसी भारतीय को ही बेची जा सकती है. लेकिन अगर किसी एनआरआई को प्रॉपर्टी उस वक्त विरासत में मिली, जब वह भारतीय था तो वह प्रॉपर्टी के साथ जैसे चाहे व्यवहार कर सकता है. यानी वह उसे बेच सकता है, किराये पर दे सकता है, ट्रांसफर कर सकता है या तोहफे में दे सकता है.
भारत के बाहर रहने वाले गैर-भारतीय मूल के विदेशी नागरिक भारत में जब तक किसी भी अचल संपत्ति का अधिग्रहण नहीं कर सकते, जब तक प्रॉपर्टी किसी ऐसे शख्स से विरासत में हासिल न की गई हो, जो भारत का नागरिक हो. गैर भारतीय मूल के विदेशी नागरिक, जिन्होंने आरबीआई की इजाजत लेकर भारत में विरासत के जरिए अचल संपत्ति हासिल की है, वे ऐसी संपत्ति को आरबीआई की इजाजत के बगैर बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकते.
एनआरआई को विरासत में मिली संपत्ति पर कैपिटल गेन्स: अगर एनआरआई प्रॉपर्टी बेच देता है तो जो शख्स प्रॉपर्टी खरीदेगा उसे इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 195 के तहत लागू दरों पर कैपिटल गेन्स की कर योग्य राशि पर आयकर कटवाना होगा. अगर उत्तराधिकारी और मृतक की संयुक्त होल्डिंग अवधि 24 महीने से ज्यादा हो गई है तो ऐसी बिक्री पर मिला फायदा लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स में गिना जाएगा. अगर संपत्ति 1 अप्रैल 2001 के बाद अधिग्रहण की गई है तो कैपिटल गेन्स की कैलकुलेशन के लिए जिस दाम पर पिछले खरीददारों ने संपत्ति खरीदी थी, उसे अधिग्रहण की लागत के तौर पर माना जाएगा. लेकिन अगर प्रॉपर्टी 1 अप्रैल 2001 से पहले अधिग्रहित की गई है तो बेचने वाले के पास कैपिटल गेन्स को कैलकुलेट करने के लिए 1 अप्रैल 2001 को प्रॉपर्टी की मार्केट वैल्यू बतौर कीमत और उस पर सूचीकरण लागू करने का विकल्प है.
एनआरआई के पास ऐसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स पर या तो 20 प्रतिशत टैक्स चुकाने का विकल्प होता है या फिर नए घर में निवेश कर सेक्शन 54 और 54एफ के तहत टैक्स छूट पाने का. इसके अलावा एनआरआई के पास प्रति वर्ष रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉरपोरेशन, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन और इंडियन फाइनेंस कॉरपोरेशन के कैपिटल गेन्स बॉन्ड्स में तय समय सीमा के भीतर 50 लाख रुपये निवेश करने का विकल्प होता है.
विरासत में मिली संपत्ति की बिक्री आय का स्वदेश में आना: एनआरआई हर साल एक मिलियन डॉलर तक की बिक्री आय को आरबीआई की मंजूरी बिना स्वदेश भेज सकता है बशर्ते भारत में टैक्स भुगतान ऐसी संपत्ति को बेचने के लिए किया गया हो. अगर राशि एक मिलियन से ज्यादा है तो आरबीआई की खास मंजूरी लेनी होगी.
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