जीएसटी की वजह से रेडी-टू-मूव अपार्टमेंट्स महंगे होंगे या सस्ते, पढ़िए हर जानकारी


जिन संपत्तियों को कंप्लीशन/अॉक्युपेंसी सर्टिफिकेट नहीं मिला है, उन पर गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) लागू होगा। हम समीक्षा कर रहे हैं कि क्या एेसे में रेडी टू मूव अपार्टमेंट्स घर खरीददारों के लिए सस्ते हो जाएंगे।
भारतीय आवास मार्केट में एक धारणा बन गई है कि गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST) सिर्फ अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टीज पर ही लागू होगा और रेडी टू मूव अपार्टमेंट जीएसटी के दायरे से बाहर होंगे। लेकिन रियल एस्टेट मार्केट के लिए नए सिस्टम के तहत टैक्स कैलकुलेशन इतनी आसान नहीं है।
उदाहरण के तौर पर अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में घर खरीददारों को बिक्री कीमत पर जीएसटी चुकाना होगा। लेकिन डिवेलपर्स सिर्फ कंस्ट्रक्शन की लागत पर क्रेडिट हासिल कर सकते हैं। बतौर बिल्डर आपको पूरे प्रोजेक्ट पर जीएसटी चुकाना होगा, लेकिन इनपुट सिर्फ कंस्ट्रक्शन की लागत पर ही हासिल किया जा सकता है। यहां एक गैप है, जो 30 प्रतिशत से कम नहीं हो सकता। नतीजन आप चाहें अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी खरीदें या रेडी-टू-मूव बिल्डर उसी अनुपात में कीमतें बढ़ा देगा, ताकि यह गैप भर जाए।

बिल्डर द्वारा बेचे जाने वाले अपार्टमेंट्स पर जीएसटी का प्रभाव:

  • रेडी टू मूव अपार्टमेंट्स पर जीएसटी नहीं लगेगा, लेकिन बिल्डर को सिर्फ कंस्ट्रक्शन की लागत पर ही इनपुट क्रेडिट मिलेगा।
  • डिवेलपर्स प्रोजेक्ट की लागत पर जीएसटी जमा और भुगतान करेंगे।
  • जीएसटी के कारण अपार्टमेंट्स महंगे हो सकते हैं।
नोएडा के घर ग्राहक प्रवीन जैन को उनके बिल्डर ने बताया था कि घर की लागत 50 लाख रुपये होगी, जो अब 1 लाख रुपये बढ़ गई है। उन्होंने सोचा कि अगर जीएसटी का मतलब टैक्स ढांचे को आसान करना और ‘वन नेशन वन टैक्स’ के युग में प्रवेश करना है तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि एक घर ग्राहक कंस्ट्रक्शन की लागत पर जीएसटी चुकाए और फिर स्टैंप ड्यूटी भरे।
जैन ने कहा कि जब रेडी टू मूव प्रॉपर्टी पर सर्विस टैक्स लागू नहीं था, तब डिवेलपर्स पोजेशन के वक्त कीमतें बढ़ा रहे थे। जीएसटी आने के बाद ग्राहकों को फायदा नहीं होगा, क्योंकि जीएसटी के अनुसार बिल्डर निर्माण के चरण पर कीमतें बढ़ा देंगे।

रियल एस्टेट मार्केट पर जीएसटी की उलझनें:

इंडस्ट्री स्टेकहोल्डर्स का फिर भी मानना है कि जीएसटी आने से घर ग्राहकों को कई फायदे मिलेंगे। निर्माण की लागत घटेगी। इसके अलावा, डिवेलपर्स के पास इनपुट क्रेडिट उपलब्ध है। जो ग्राहक अॉक्युपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) मिलने के बाद घर खरीदेंगे, उन्हें मौजूदा मार्केट में समझौते के अतिरिक्त टैक्स नहीं भरने पड़ेंगे।
CRISIL की रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल डिेवेलपर्स को सीमेंट और स्टील जैसे इनपुट्स पर 27.7 और 18.1 प्रतिशत एक्साइज एवं वैट चुकाना पड़ता है। यह दर हर राज्य में अलग-अलग है। अब नए जीएसटी सिस्टम के तहत सीमेंट और स्टील पर 28 और 18 प्रतिशत जीएसटी लगेगा। इसके अलावा पेंट और वाइट गुड्स पर 28 प्रतिशत टैक्स लगाया जाएगा। हालांकि आखिरी प्रॉडक्ट यानी घर पर 12 प्रतिशत का टैक्स चुकाना होगा, जिसमें इनपुट पर चुकाए गए टैक्स का क्रेडिट शामिल है। चूंकि पूरी लागत पर, जिसमें जमीन भी शामिल है, 12 प्रतिशत टैक्स लगेगा, यह राशि डिवेलपर्स के लिए इनपुट क्रेडिट मुहैया कराने के लिेए पर्याप्त है। इसलिए जो लोग रेडी टू मूव का विकल्प चुन रहे हैं, वे टैक्स के बोझ से बचे रहेंगे।

जीएसटी की वजह से स्टेकहोल्डर्स करेंगे नए बिजनेस मॉडल का मूल्यांकन:

इन्वेस्टमेंट बैंकिंग फर्म मंडरस में मैनेजिंग पार्टनर नौशाद पंजवानी ने कहा कि अगर प्रोजेक्ट को अॉक्युपेंसी सर्टिफिकेट मिल गया है तो कोई जीएसटी नहीं लगेगा। उनके मुताबिक डिवेलपर्स की लागत में इनपुट क्रेडिट के कारण कमी आएगी, लेकिन इस पर काफी स्पष्टता की जरूरत है। पंजवानी ने कहा, ”छोटे सप्लायर्स जिनका टर्नओवर 75000 रुपये से कम है, उन्हें जीएसटी में पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं है। एेसे मामलों में बिल्डर को फायदा नहीं मिलेगा और उसे अकाउंटिंग के वक्त सावधान रहना होगा। इसलिेए हो सकता है कि वह रजिस्टर्ड डीलर्स से सामान खरीदे। इससे छोटे व्यापारियों को बिजनेस में नुकसान हो सकता है।”
हवेलिया समूह के मैनेजिंग डायरेक्टर निखिल हवेलिया ने कहा कि बिल्डर्स अब तक ‘बनाओ और बेचो’ मॉडल के फायदों का मूल्यांकन कर चुके हैं। नए टैक्स स्ट्रक्चर और अन्य विनियामक ढांचे के तहत रेडी टू मूव अपार्टमेंट ग्राहकों के लिए ज्यादा फायदेमंद हैं और बिल्डर्स के लिए भी। हवेलिया ने कहा, ग्राहक यह भी पूछ रहे हैं कि क्या वे बाकी राशि का अग्रिम भुगतान कर सकते हैं, ताकि अगली तिमाही से लागू होने वाले 12 प्रतिशत जीएसटी से बच सकें।
वित्तीय सेवाओं पर भी 18 प्रतिशत जीएसटी लागू होगा। इसलिए जीएसटी के तहत लोन प्रोसेसिंग चार्जेज भी बढ़ सकते हैं। एेसे चार्जेज हमेशा ग्राहकों के लिए मूल्य रहे हैं। हो सकता है इसका अफोर्डेबल हाउसिंग सेगमेंट पर ज्यादा असर न हो, क्योंकि लोन प्रोसेसिंग चार्जेज पर 18 प्रतिशत 1 प्रतिशत की रेंज में होगा, जो व्यावहारिक रूप से बहुत कम है। लेकिन लग्जरी सेगमेंट में यह ग्राहकों की जेब खूब ढीली करेगा।
(लेखक Track2Realty के CEO है )
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