भारतीय रियल एस्टेट पर कोरोना वायरस महामारी का असर


ऐसे हालात में जब कोरोना वायरस महामारी के दुष्परिणाम दुनिया भर में महसूस किए जा रहे हैं, रियल एस्टेट सेक्टर पर कोविड-19 के असर को लेकर राय अलग-अलग है. सबसे बड़ी स्वास्थ्य इमरजेंसी के कारण वर्क फ्रॉम होम एक्सपेरिमेंट पूरे विश्व में लागू हो गया है, जिससे कोरोना वायरस काल के बाद ऑफिसों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है.

दिसंबर 2019 के बाद दुनिया में कोरोना वायरस की दस्तक के बाद काफी कुछ बदल गया है. दुनिया के विभिन्न देश सख्त से सख्त नियमों को लागू कर रहे हैं ताकि महामारी को काबू में किया जा सके. पूरी दुनिया में व्यापार चरमरा गए हैं, जिसकी वजह से मौद्रिक एजेंसियों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट का अनुमान लगाया है, जिसमें भारत भी शामिल है.

एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने 14 सितंबर 2020 को वित्त वर्ष 2020-21 के लिए भारत के विकास दर अनुमान को -9 प्रतिशत आंका है, जो पहले -5 प्रतिशत था. वो इसलिए क्योंकि देश में मरीजों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी. एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिस्ट विश्रुत राणा ने कहा, ‘प्राइवेट इकोनॉमिक एक्टिविटी को बढ़ने से रोकने वाला एक कारण कोविड-19 है.’ 6 अक्टूबर को भारत में कुल मरीज 6,685082 थे.

वित्त वर्ष 2021 की पहली तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की संख्या के बाद पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही की तुलना में 23.9% की गिरावट देखी गई. ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडी और फिच ने भी मौजूदा वित्त वर्ष में भारतीय इकोनॉमी में क्रमश: 11.5 प्रतिशत और 10.5 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया है.

ऐसे हालात में जब कोरोना वायरस महामारी के दुष्परिणाम दुनिया भर में महसूस किए जा रहे हैं, रियल एस्टेट सेक्टर पर कोविड-19 के असर को लेकर राय अलग-अलग है. सबसे बड़ी स्वास्थ्य इमरजेंसी के कारण वर्क फ्रॉम होम एक्सपेरिमेंट पूरे विश्व में लागू हो गया है, जिससे कोरोना वायरस काल के बाद ऑफिसों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है.

वहीं भारत में, जहां आर्थिक संकुचन संकेत दे रहे हैं कि रिकवरी देरी से होगी. भारत में लॉकडाउन 25 मार्च से शुरू हुआ था और 7 जून 2020 तक उसे बढ़ा दिया गया. इस दौरान मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा होता रहा. इस वजह से एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की स्थिति खराब होती चली गई.

जैसा कि साफ है कि रिसर्च एजेंसियां भारत में अचल संपत्ति के विकास में एक ठहराव की भविष्यवाणी कर रही हैं. PropTiger.com के डेटा के मुताबिक भारत के 9 बड़े शहरों में हाउसिंग सेल्स अप्रैल-जून 2020 के दौरान 79 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.

PropTiger.com, Makaan.com और Housing.com के ग्रुप सीईओ ध्रुव अग्रवाल ने कहा, ‘चीनी अर्थव्यवस्था दिसंबर 2019 के बाद से कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रभाव में जकड़ी रही, वहीं भारत में स्थिति मार्च 2020 में ही चिंताजनक होने लगी थी. लॉकडाउन के कारण पूरे देश में आर्थिक गतिविधियां रुक गईं. इससे सभी सेक्टर्स को चोट पहुंची, जिसमें रियल एस्टेट भी शामिल है. कोरोना वायरस का प्रतिकूल प्रभाव पिछले वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में आवास की बिक्री पर दिखाई दे रहा है क्योंकि मार्च आमतौर पर बिक्री के लिए सबसे बड़े महीने में से एक है.’

हालांकि भारत में ऑफिस स्पेस के सौदे की संख्या में 2019 में 27% का इजाफा हुआ है. 60 मिलियन वर्ग फुट के सबसे उच्च स्तर पर, भारत के वाणिज्यिक क्षेत्र में वृद्धि की रफ्तार भी वायरस के हमले के कारण पटरी से उतरने की संभावना है.

वैश्विक आपदा रुख के अचानक फैलने से पहले इसके विकास के बारे में कोई भी सकारात्मक भविष्यवाणी खत्म हो गई क्योंकि सरकार सामान्य रूप से व्यवसायों को रोकने और अर्थव्यवस्था को गर्त में जाने से रोकने में जुट गई. इस दौरान अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपया 78 रुपये तक लुढ़कने का डर पैदा हो गया.

हालांकि नुकसान की वास्तविक सीमा एक ऐसे परिदृश्य में पकड़ना मुश्किल है, जहां हर दिन बहुत फर्क नजर आ रहा है, एक बात निश्चित है – भारत के रियल एस्टेट क्षेत्र को संसर्ग के कारण अल्पकालिक झटके झेलने होंगे.

भारत के शीर्ष 8 शहरों में आवास बाजार (अप्रैल-जून 2020)

सेल्सगिरावट 79%
प्रोजेक्ट लॉन्चेजगिरावट 81%
इन्वेंट्री738,335 यूनिट्स

स्रोत: Proptiger Datalabs

COVID-19 का भारतीय आवास बाजार पर प्रभाव

कोरोना वायरस प्रसार ने रिकवरी में और देरी की है मांग को पुनर्जीवित करने के विभिन्न सरकारी उपायों के कारण संभव लग रही थी, हालांकि, अभी, ऐसा नहीं लगता है कि कीमतें तुरंत नीचे चली जाएंगी.

NAREDCO के राष्ट्रीय अध्यक्ष निरांजन हीरानंदानी ने कहा, ‘दूसरे सबसे बड़े रोजगार प्रदाता भारतीय रियल्टी को उबारने के लिए, न सिर्फ जीडीपी ग्रोथ के मकसद से बल्कि रोजगार पैदा करने के लिए भी, इस सेक्टर से 250 से ज्यादा इंडस्ट्रीज पर विभिन्न प्रकार का असर पड़ता है.’

रुके हुए प्रोजेक्ट्स के लिए 25 हजार करोड़ रुपये के स्ट्रेस फंड बनाने के अलावा केंद्र सरकार ने हाल ही में खरीद को अधिक आकर्षक बनाने के लिए होम लोन पर अधिक टैक्स ब्रेक और कम ब्याज दरों की घोषणा की.

रिहायशी सेग्मेंट्स में मांग में कमी से पहले से ही भारत के आवासीय रियल्टी क्षेत्र में आवास की बिक्री, परियोजना की शुरूआत और मूल्य वृद्धि में कमी आई है, जो मेगा नियामक परिवर्तनों जैसे रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (RERA),  वस्तु एवं सेवा कर (GST), नोटबंदी और बेनामी संपत्ति कानून के कारण दबाव में है.

कोरोना वायरस का प्रभाव

-घर खरीदार प्रॉपर्टी खरीद का अपना फैसला स्थगित कर सकते हैं क्योंकि वे जॉब सिक्योरिटी को लेकर स्पष्ट होना चाहते हैं.

-कंस्ट्रक्शन मटीरियल की सप्लाई में देरी और लेबर की कमी के कारण चालू प्रोजेक्ट्स की डिलिवरी में देरी हो सकती है.

-दुनिया भर की कंपनियों ने कर्मचारियों के लिए रिमोट वर्किंग का ऐलान किया है.  ताकि कोविड-19 को फैलने से रोका जा सके. नतीजतन, ऑफिसों के रेट्स में गिरावट आ सकती है क्योंकि रिमोट वर्किंग बढ़ेगी.

-कोरोना वायरस के कारण मॉल, रिटेल आउटलेट्स और एंटरटेनमेंट वेंचर्स बंद हैं. इससे भविष्य में कमर्शियल रियल एस्टेट डील्स रुक सकती हैं.

रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक अगर महामारी को जल्द नहीं रोका गया तो यह न सिर्फ इकोनॉमी को प्रभावित करेगा बल्कि डेवेलपर्स के कैश फ्लो और प्रोजेक्ट डिलिवरी की क्षमता पर भी असर डालेगा.

ICRA ने कहा, ‘हालांकि लंबे समय तक प्रकोप के मामले में, पूरी आर्थिक गतिविधि पर प्रभाव ज्यादा गहरा और निरंतर होने की संभावना है, जिसके परिणामस्वरूप डेवेलपर्स के कैश फ्लो और परियोजना निष्पादन क्षमताओं पर अधिक गहरा असर पड़ेगा, जिससे व्यापक ऋण-नकारात्मक प्रभाव पैदा होंगे.’ ICRA ने यह भी कहा कि 28 मार्च को आरबीआई द्वारा 3 महीने के लोन मोरेटोरियम के ऐलान से बिल्डर्स को थोड़ी राहत मिलेगी. 22 मई 2020 को आरबीआई ने इस मोरेटोरियम को 21 अगस्त 2020 तक बढ़ा दिया था. इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है क्योंकि आर्थिक स्थिति बिगड़ती जा रही है.

जेएलएल इंडिया के कंट्री हेड और सीईओ रमेश नायर ने कहा, ‘वित्तीय संस्थानों द्वारा सभी टर्म लोन पर मोरेटोरियम के अलावा 3.74 लाख करोड़ रुपये (RBI द्वारा) की तरलता कम अवधि में पैसों की चिंताओं को कम करेगी और डेवलपर्स के साथ-साथ घर खरीदारों को मदद करेगी.

परियोजना को पूरा करने में देरी की उम्मीद और बिल्डर समुदाय को समर्थन देने के लिए, सरकार ने यह भी कहा है कि डेवेलपर्स को RERA के माध्यम से छह महीने तक परियोजना की समय सीमा को बढ़ाने के लिए कहा जा सकता है.

मोतीलाल ओसवाल रियल एस्टेट फंड्स के सीईओ और हेड शरद मित्तल ने कहा, ‘COVID-19 के प्रकोप के कारण घोषित लॉकडाउन के कारण, निर्माण और बिक्री गतिविधि पूरे रियल एस्टेट सेक्टर में पूरी तरह रुक गए हैं. विभिन्न साइट्स पर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स भी अपने गृह नगर वापस चले गए हैं. लॉकडाउन के बाद गतिविधि दोबारा धीरे-धीरे शुरू होगी, जिससे प्रोजेक्ट्स में कम से कम 4 से 6 महीने की देरी होगी.’

Elara technologies के ग्रुप सीओओ मनी रंगराजन ने कहा, ‘मौजूदा प्रोजेक्ट्स की डिलिवरी को आगे बढ़ाया जा सकता है. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इनपुट सप्लाई-चेन और लेबर की मौजूदगी कितनी जल्दी बहाल होती है. इसलिए, नई सप्लाई में गिरावट अगली कुछ तिमाहियों तक जारी रह सकती है, क्योंकि डेवलपर्स डिमांड की वापसी का इंतजार करेंगे.’

भारत में घर खरीदारों पर कोविड-19 का प्रभाव

अगर कम ब्याज दर (होम लोन की ब्याज दरें अभी 7% से नीचे हैं) और हाई टैक्स छूट (होम लोन के ब्याज भुगतान के खिलाफ छूट के रूप में 3.50 लाख रुपये प्रति वर्ष के रूप में अधिक है) कंज्यूमर बिहेवियर में बदलाव करने जा रहे थे, तो कोरोना वायरस प्रकोप उसमें कम से कम मध्यावधि तक ठहराव लाने वाला है.

चूंकि प्रॉपर्टी खरीदने की चाह रखने वाले लोग साइट विजिट के लिए जा नहीं पा रहे हैं तो उससे वे प्रॉपर्टी खरीद का फैसला स्थगित कर सकते हैं.
हीरानंदानी ने कहा, ‘कोरोना वायरस ने इकोनॉमी के हर सेक्टर पर असर डाला है. इसकी जकड़ में देश का रियल्टी सेक्टर भी आया है, जो इकोनॉमी और पॉलिसी रिफॉर्म्स के बाद लगातार चुनौतियों का सामना कर रहा है.’ यह फरवरी के अंत से साफ नजर आ रहा है जबकि साइट विजिट न के बराबर है और फैसले लेने की प्रक्रिया बेहद विलंबित है.

तथ्य यह है कि कारोबारी अपने कर्मचारियों की संख्या को कम कर देंगे और कई भावी खरीदार प्रॉपर्टी खरीद पर अंतिम फैसला लेने से पहले अपनी नौकरी की सुरक्षा पर स्पष्टता की प्रतीक्षा करने के लिए मजबूर होंगे.

भले ही आरबीआई ने कई रेट कट्स का ऐलान किया है, रेपो रेट को 4 प्रतिशत तक लाया गया है लेकिन ग्राहकों की भावनाओं पर कोई भी सकारात्मक प्रभाव मध्य या लंबी अवधि में ही नजर आएगा. हालांकि इस कदम से मौजूदा ग्राहकों को एक समर्थन जरूर मिलेगा, जो मध्य या लंबी अवधि में लॉकडाउन या नौकरी चले जाने से ईएमआई चुकाने में परेशानी महसूस कर रहे हैं.

हालांकि महामारी ने ग्राहकों को होम ओनरशिप का अहसास दिला दिया है. ये रिहायशी रियल एस्टेट के लिए अच्छा कदम है.

NARECCO के साथ Housing.com द्वारा कराए गए एक सर्वे के मुताबिक 53 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने प्रॉपर्टी खरीदने का अपना प्लान 6 महीने के लिए स्थगित कर दिया है और वे उसके बाद ही बाजार में लौटेंगे. 33 प्रतिशत लोगों ने कहा कि घर से काम करने के लिए उन्हें अपने घर को अपग्रेड करना होगा. किरायेदारों के सर्वे में 47 लोगों ने कहा कि अगर कीमत सही हो तो वे प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करना चाहेंगे.

रंगराजन ने कहा, ‘हम ऑनलाइन डिमांड के साथ-साथ रियल एस्टेट में डिजिटाइजेशन में बढ़ोतरी देख रहे हैं क्योंकि डेवेलपर्स और ग्राहकों ने वर्चुअल टूर्स, ड्रोन शूट्स, वीडियो कॉल्स और ऑनलाइन बुकिंग प्लेटफॉर्म्स जैसे प्रोडक्ट्स को अपना लिया है. हम रियल एस्टेट सेक्टर में शिफ्ट देख सकते हैं, जहां प्रॉपर्टी को किराये पर देने, खरीदने में टेक्नोलॉजी अहम रोल निभाएगी. वहीं कुछ राज्यों में प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन हो सकता है. हालांकि फिजिटल साइट विजिट अहम रहेगी, लेकिन ग्राहक नया घर देखने और बुकिंग के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करेंगे. खरीदार पहले की तुलना में कम साइट विजिट करेंगे.

कोविड-19 का भारत में बिल्डर्स पर प्रभाव

देश के गैर-बैंकिंग वित्त क्षेत्र में चल रहे संकट के बावजूद बढ़ते अनसोल्ड स्टॉक को लेकर मंदी के शिकार बिल्डर्स की सरकार से उम्मीदें हैं. गैर-बैंकिंग वित्त क्षेत्र हाउसिंग सेक्टर की फंडिंग का अहम स्रोत है. इससे खरीदारी बेहद मुश्किल हो गई है और जिस समय के भीतर प्रोजेक्ट डिलिवरी का वादा उन्होंने किया था, वह मुश्किल में आ गया है.

प्रॉपटाइगर के डेटा के मुताबिक, जून 2020 तक डेवेलपर्स के पास 6 लाख करोड़ रुपये का बिना बिका स्टॉक है. कोरोना वायरस की चेन तोड़ने के लिए भारत में लगाए गए लॉकडाउन के बीच कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी रुक गई थीं जिसके कारण चीन से मैन्युफैक्चरिंग मटीरियल और उपकरणों की आपूर्ति में देरी हो गई. इस वजह से चालू परियोजनाओं की डिलिवरी की समयसीमा आगे बढ़ाई जाएंगी, नतीजतन डेवलपर्स के लिए समग्र लागत में इजाफा होगा.

हालांकि सख्त कदमों से चीन, जहां से कोरोना वायरस का जन्म हुआ, वह महामारी पर काबू पाने में कामयाब रहा और कामगार भी दफ्तरों में लौटने लगे हैं. हालांकि दोनों पड़ोसियों के बीच तनाव के कारण यहां बिल्डर्स को अपने ऑर्डर्स स्थगित करने पड़ेंगे.

कोरोना वायरस के कारण पैदा हुए हालातों से निपटने के लिए सरकार ने कई ऐलान किए हैं, जिसमें डेवेलपर्स के लिए ईएमआई हॉलिडे जैसे कदम शामिल हैं, जो उन्हें राहत पहुंचाएंगे.

हीरानंदानी ने कहा, “महामारी ने विशेष रूप से संवेदनशील समय में चोट पहुंचाई है. सारी रियल्टी कंपनियों में यही वो वक्त होता है, जब बैलेंस शीट का सांविधिक भुगतान और सुव्यवस्थितिकरण होता है.”

भारत में ऑफिस स्पेस पर कोविड-19 का प्रभाव

जिन सेक्टर्स में वर्क फ्रॉम होम का विकल्प नहीं है, वहां लोग धीरे-धीरे काम पर लौट रहे हैं. लेकिन कई कंपनियों में काम करने का तरीका अब भी वर्क फ्रॉम होम ही बना हुआ है.

कुशमैन एंड वेकफील्ड के इंडिया एंड एसई एशिया के एमडी अंशुल जैन ने कहा, ‘लॉकडाउन के दौरान, भारत ने वर्कप्लेस में बदलाव के साथ बहुत अच्छा मुकाबला किया और सीमित री-ओपनिंग के साथ ऐसा करना जारी रखा. हम मानते हैं कि आगे बढ़ने से, वर्कप्लेस अब एक ही स्थान नहीं होगा, बल्कि सुविधा और कार्यक्षमता का समर्थन करने के लिए स्थानों और अनुभवों से संचालित एक पारिस्थितिकी तंत्र होगा.

पहले इन्फेक्शन तेजी से फैला. इससे दुनियाभर की कंपनियों ने कर्मचारियों को घर से काम करने को कहा ताकि वायरस को फैलने से रोका जा सके. इससे इस बहस ने जन्म लिया कि क्या भविष्य में वर्क फ्रॉम होम ऑफिस स्पेस की जगह ले सकता है. हालांकि इस सवाल का जवाब वर्क फ्रॉम होम के माध्यम से व्यवसायों द्वारा हासिल की गई सफलता के अंतिम स्तर पर निर्भर करता है. लेकिन भारत में कमर्शियल रियल एस्टेट सेगमेंट के लिए एक झटका है.

हालांकि इस सेगमेंट के डेवेलपर्स आशावादी हैं क्योंकि उनके पास कैश तक बेहतर पहुंच है और डिफॉल्ट का रिस्क कम है. वायरस का असर ऑफिस स्पेस पर भी दिख रहा है. इंटरनेशनल प्रॉपर्टी ब्रोकरेज जेएलएल के मुताबिक, कॉर्पोरेट स्पेस के नेट लीजिंग में जुलाई से सितंबर 2020 की तिमाही में 50% की गिरावट आई, सात प्रमुख शहरों में 5.4 मिलियन वर्ग फुट में कॉरपोरेट और को-वर्किंग प्लेयर्स महामारी के बाद अपनी विस्तार योजनाओं को टालते रहे.

ऑफिस स्पेस की शुद्ध खपत दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पुणे, हैदराबाद और बेंगलुरु सहित सात शहरों में एक साल पहले की अवधि में 10.9 मिलियन वर्ग फुट था. जनवरी-सितंबर 2020 की अवधि के दौरान, नेट ऑफिस स्पेस लीजिंग 2019 में इसी अवधि में 32.7 मिलियन वर्ग फुट से 47% घटकर 17.3 मिलियन वर्ग फुट रह गई. वर्क फ्रॉम होम कॉन्सेप्ट के कारण ऑफिस स्पेस की डिमांड में कमी आई है.

एक बयान में जेएलएल ने कहा, ‘कॉरपोरेट अधिभोगियों के ऑफिस स्पेस कन्सॉलिडेशन और ऑप्टिमाइजेशन स्ट्रैटजी में बढ़ोतरी हुई है, जिस वजह से मातहत शुद्ध अवशोषण का चरण आ चुका है, जो नई कमी के साथ रफ्तार नहीं रख सकता.’ इसके परिणामस्वरूप Q3 2020 में कुल वैकंसी 13.1% से बढ़कर Q2 2020 में 13.5% हो गई.

हालांकि, एक्सपर्ट्स को उम्मीद है कि इस सेगमेंट में कोविड-19 से पहले वाली स्थिति बहाल हो जाएगी. ग्लोबल प्रॉपर्टी ब्रोकरेज नाइट फ्रैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक,  2020 के पहले नौ महीनों में 11 सौदों में 2.31 बिलियन अमेरिकी डॉलर के कुल निजी इक्विटी निवेश में, ऑफिस सेक्टर का हिस्सा 81 प्रतिशत रहा. जबकि वेयरहाउसिंग का 10 प्रतिशत और रेजिडेंशियल का 9 प्रतिशत.

नाइट फ्रैंक इंडिया के सीएमडी शिशिर बैजल ने कहा, ‘निवेश के लिए मजबूत विकास क्षमता वाले ग्रेड एक असेट्स को स्काउट करने के लिए प्राइवेट इक्विटी इन्वेस्टर्स ने इकोनॉमिक स्लोडाउन की अवधि का भरपूर फायदा उठाया है. नतीजतन, ऑफिस सेगमेंट में संपत्ति में सकारात्मक निवेश गतिविधियां देखी गईं. ऑफिस निवेश के लिए औसत सौदे का आकार भी साल 2019 की तुलना में 2020 में उल्लेखनीय रूप से अधिक देखा गया था.’

यह कहते हुए कि अपनी मजबूत बुनियाद के कारण यह सेक्टर निवेशकों को लुभाना जारी रखेगा, रिपोर्ट में कहा गया कि इस असेट क्लास में इन्वेस्टमेंट मध्य से लंबी अवधि में सकारात्मक रहेगी.

यह बताते हुए कि वर्क फ्रॉम होम कोरोना वायरस प्रकोप को रोकने के लिए देशव्यापी तालाबंदी की प्रतिक्रिया थी और यह रियल एस्टेट स्ट्रैटजी में एक स्थायी अवधारणा बनने की संभावना नहीं है.

सीबीआरई के मिडिल ईस्ट एंड अफ्रीका, इंडिया, साउथ ईस्ट एशिया के सीईओ और चेयरमैन अंशुमन मैगजीन ने कहा, वाणिज्यिक अचल संपत्ति की मांग मजबूत रहेगी. मीडिया को एक बयान मैगजीन ने कहा, ‘यह कर्मचारियों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव, डेटा सुरक्षा और निगरानी उत्पादकता जैसी चुनौतियों के कारण है.’

सीबीआरई के पास उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, सकल ऑफिस स्पेस अवशोषण 2019 में 63.5 मिलियन वर्ग फुट के ऐतिहासिक उच्च स्तर को छू गया, जो 2018 की तुलना में लगभग 30% अधिक है. सात प्रमुख शहरों में ऑफिस का स्टॉक 2020 के आखिर तक 660 मिलियन वर्ग फुट को पार करने की उम्मीद है.

भारत में मॉल डेवेलपर्स पर कोविड-19 का असर

इससे पहले कि सरकार पूरी तरह से तालाबंदी का आदेश देती, वायरस फैलने की चिंता से भारत में मॉलों में लोगों की संख्या कम हो गई है. सरकार द्वारा प्रतिबंध हटाए जाने के बाद भी इस सेगमेंट पर मार पड़ती रही. मॉल्स को ऑपरेट करने की इजाजत है लेकिन कड़े नियम व शर्तों के साथ. रिटेलर्स असोसिएशन ऑफ इंडिया (RAI) के सर्वे के मुताबिक, लॉकडाउन छूट के कारण खुदरा विक्रेताओं को फायदा नहीं हुआ क्योंकि व्यापार में कमी बनी रही.

कुशमैन एंड वेकफील्ड के रिसर्च हेड रोहन शर्मा ने कहा, ‘लोगों की कम आवाजाही और मॉल्स बंद रहने के कारण डेवेलपर्स की प्रोजेक्ट के एवज में कर्ज की सर्विसिंग पर असर पड़ेगा. लघु-से-मध्यम अवधि के लिए बैंकों से छूट का भी बड़ा प्रभाव नहीं होना चाहिए. लेकिन अगर एक या दो तिमाहियों तक वायरस का प्रकोप रहा तो कर्ज की सर्विसिंग की चुनौती लंबे समय तक रह सकती है.’

शर्मा ने कहा, ‘आखिरकार, लोगों की आवाजाही सामान्य स्थिति में वापस आ जाएगी क्योंकि लोगों को बड़ी संख्या में सार्वजनिक स्थानों पर विश्वास हासिल करने में समय लगेगा. यह एक मौलिक बदलाव भी लाएगा कि मॉल मालिक अब अपनी संपत्तियों को कैसे देखेंगे. हवा की गुणवत्ता, स्वच्छता और स्वच्छता और जागरूकता में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जो लोगों को उनके मॉल में वापस लाएगा.’

हीरानंदानी ने कहा, ‘ रिटेल आउटलेट्स और मॉल के बंद होने के साथ-साथ मनोरंजन और फिटनेस केंद्रों के रूप में COVID-19 के प्रभाव ने वाणिज्यिक रियल एस्टेट सौदों को वेट एंड वॉच की स्थिति में ला खड़ा किया है.
नायक के मुताबिक, मॉल ऑपरेटर्स सबसे ज्यादा प्रभावित हैं और उन्हें शॉपिंग मॉल में बढ़ती वैकेंसीज की परियोजनाओं के बीच संकट से निपटने के लिए उचित कार्य करना होगा.

भारत में वेयरहाउसिंग पर कोविड-19 का प्रभाव

यह अनुमान जताते हुए कि कोविड-19 के बाद की दुनिया में ई-कॉमर्स तेजी से बढ़ेगी. यह भी अनुमान है कि भारत में वेयरहाउसिंग सेक्टर को अत्यधिक लाभ होगा. ज्यादा जरूरी यह है कि यह ग्रोथ सिर्फ बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं होगा बल्कि छोटे शहरों तक भी फैलेगा.

प्रॉपर्टी कंसलटेंसी फर्म सैविल्स इंडिया के मुताबिक, 2020 में नए वेयरहाउसिंग स्पेस की सप्लाई 45 मिलियन वर्ग फुट के पहले के प्रक्षेपण के मुकाबले केवल 12 मिलियन वर्ग फुट हो सकती है. हालांकि लंबी अवधि में जैसे-जैसे मांग बढ़ती है
30-35 नए टियर -2 और टियर -3 शहरों में एक महत्वपूर्ण क्षमता वृद्धि की उम्मीद की जा सकती है.

कोरोना वायरस के बाद भारतीय रियल एस्टेट: शीर्ष 11 अनुमान

1. साइट विजिट में गिरावट आएगी, जिससे बिक्री के आंकड़ों पर असर पड़ेगा.

2. प्रोजेक्ट की डेडलाइन्स बढ़ेंगी, प्रोजेक्ट पूरा होने में वक्त लगेगा.

3. देरी के बीच प्रोजेक्ट की समग्र लागत बढ़ेगी और सप्लाई में गिरावट आएगी.

4. इन्वेंट्री लेवल्स बढ़ेंगे, जिससे बिल्डर्स पर हद से ज्यादा प्रेशर बढ़ेगा.

5. कम डिमांड के बावजूद कीमतें कुछ जरूर बढ़ेंगी.

6. रेपो रेट 4 प्रतिशत तक आने के बाद होम लोन की ब्याज दरें कम हो जाएंगी.

7. भविष्य में रिमोट वर्किंग को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि कारोबार भी वर्क फ्रॉम होम के कल्चर को अपनाएंगे.

8. ऑफिस स्पेस के लिए भविष्य में ज्यादा इन्वेस्टमेंट की जा सकती है ताकि उन्हें आपात स्थितियों के लिए तैयार किया जा सके.

9. निकट भविष्य में ऑफिस स्पेस में ऑक्युपेंसी लेवल्स में गिरावट आ सकती है क्योंकि रिमोट वर्किंग में बढ़ोतरी होगी.

10. रियल एस्टेट में एनआरआई के निवेश से रुपये में गिरावट का दौर थमेगा.

11. पैसों की कमी की स्थिति और खराब होने के कारण बिल्डर इन्सॉल्वेंसी के मामले बढ़ सकते हैं.

पूछे जाने वाले सवाल

क्या कोविड-19 के कारण प्रॉपर्टी की कीमतों पर असर पड़ेगा?

कीमतें किसी भी महत्वपूर्ण बदलाव से नहीं गुजर सकती हैं क्योंकि परियोजनाओं की समग्र लागत बढ़ने की संभावना है.

क्या कोविड-19 के कारण घरों की बिक्री पर असर पड़ेगा?

हाउसिंग सेल्स में कोरोना काल के बाद गिरावट आ सकती है क्योंकि कारोबारी नुकसान की भरपाई करने के लिए कर्मचारियों को नौकरी से निकाल सकते हैं.

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