एक नहीं अलग-अलग है बैनामा और बिक्री समझौता, जानिए क्या है दोनों में फर्क


किसी अचल संपत्ति का बिक्री समझौता और बैनामा एक ही संपत्ति के लिए समान नहीं होता। आज हम घर खरीददारों और विक्रेताओं को दोनों के बारे में कानूनी नजरिए से कुछ अहम फर्क बताने जा रहे हैं
अंतिम नतीजे तक पहुंचने से पहले प्रॉपर्टी की खरीद कई प्रक्रियाओं से गुजरती है. लेनदेन को आगे बढ़ाने के लिए दस्तावेजी सहायता के जरिए हर चरण पर खरीदार और विक्रेता प्रक्रिया को औपचारिक बनाने की कोशिश करते हैं। प्रॉपर्टी खरीदते वक्त खरीददार और विक्रेता के बीच एक समझौता होता है। समझौते का फॉर्म और फॉर्मेट भिन्न हो सकता है। यह या तो बिक्री समझौता होगा या फिर बैनामा। सेल डीड अग्रीमेंट फॉर सेल से काफी अलग है.
आमतौर पर लोग इन दोनों दस्तावेजों के बीच फर्क समझ नहीं पाते और इन्हें एक दूसरे का पर्यायवाची समझ लेते हैं। लेकिन अगर आप भी इन्हें एक ही समझने की गलती कर रहे हैं तो सचेत हो जाइए. सेल डीड और बैनामा (अग्रीमेंट फॉर सेल) से काफी अलग है. एक डीड है और दूसरा एग्रीमेंट. चूंकि दोनों दस्तावेजों में एक आम शब्द है ‘सेल’ इसलिए लोग इन्हें एक ही समझ लेते हैं. हालांकि
इन दो दस्तावेजों की जरूरत संपत्ति लेनदेन पर उनके प्रभाव के बीच एक बड़ा अंतर पैदा करती है. इन दो दस्तावेजों के बीच क्या फर्क है, आइए इसके बारे में आपको बताते हैं.

क्या होती है सेल डीड

सेल डीड एक प्रकार की कन्वेयंस डीड है, जिसे प्रॉपर्टी की बिक्री के वक्त तैयार किया जाता है. इस डीड पर साइन करने का मतलब है कि बिक्री की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. साइन करने के बाद, खरीदार पूरी तरह प्रॉपर्टी का मालिक बन जाता है.

क्या होता है अग्रीमेंट टू सेल

जब खरीदार और विक्रेता प्रॉपर्टी के लेनदेन को लेकर समझौता करते हैं तो वे अग्रीमेंट बनाते हैं, जिसके बाद वे नियम व शर्तें तय होती हैं, जिनके आधार पर लेनदेन होगी. इस दस्तावेज को सेल अग्रीमेंट या अग्रीमेंट टू सेल कहा जाता है.

जब बात प्रॉपर्टी से जुड़े दस्तावेजों की आती है तो अतिरिक्त सावधानी बरतना बहुत जरूरी हो जाता है. नीचे ऐसी एक घटना के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं.

31 अक्टूबर 2020 को एक 40 साल के शख्स को नोएडा पुलिस ने 2 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. उसने  पैसा पाने के लिए सेल डीड के नकली कागजात तैयार कराए. उसी दिन मदुरै के मुख्य सत्र जज जी इलंगोवन ने दो उप-रजिस्ट्रारों को अग्रिम जमानत दी, जिन्हें डिंडीगुल जिला अपराध शाखा ने पूर्व सत्यापन के बिना दस्तावेजों को दर्ज करने के आरोप में गिरफ्तार किया था. पुलिस के अनुसार, दोनों ने एन्कमब्रन्स सर्टिफिकेट, साथ ही मूल दस्तावेज, पैरेंट दस्तावेज, मृत्यु प्रमाण पत्र आदि की पुष्टि किए बिना सेल डीड को रजिस्टर किया.

इस आर्टिकल में हम आपको दोनों दस्तावेजों के फर्क के बारे में बताएंगे.

बैनामा Vs बिक्री समझौता

सेल डीड बिक्री समझौता
सेल डीड प्रॉपर्टी के स्वामित्व का वास्तविक हस्तांतरण है. बिक्री समझौता संपत्ति के स्वामित्व के भविष्य के हस्तांतरण का वादा है
सेल डीड में दोनों पार्टियों (खरीदार और विक्रेता) के बारे में पूरी जानकारी होती है जैसे उम्र, पता और अन्य जानकारियां बिक्री समझौते में वो सारे नियम व शर्तें लिखी होती हैं, जिनके तहत प्रॉपर्टी को ट्रांसफर किया जाएगा.
सेल डीड के जरिए प्रॉपर्टी के सारे अधिकार और हित नए मालिक के पास चले जाते हैं.  

बिक्री समझौता खरीदार को कुछ शर्तों की संतुष्टि पर संपत्ति खरीदने का अधिकार देता है.

खरीदार को सेल डीड को निष्पादित करने के लिए स्टांप शुल्क और पंजीकरण शुल्क का भुगतान करना पड़ता है. सेल अग्रीमेंट सेल डीड से पहले आया था. इसमें गैर-न्यायिक स्टैंप पेपर पर खरीदार और विक्रेता के दस्तखत होते हैं.

क्या होता है बिक्री समझौता?

एक बिक्री समझौता भविष्य में प्रॉपर्टी बेचने का अग्रीमेंट होता है। इसमें वह सभी नियम व शर्तें लिखी होती हैं, जिनके तहत प्रॉपर्टी ट्रांसफर की जाती है। ट्रांसफर अॉफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882, जिसमें संपत्ति की बिक्री और खरीद से जुड़े मामलों की परिभाषा लिखी है, के मुताबिक अचल संपत्ति की बिक्री के लिए दो पक्षों के बीच तय हुई शर्तों का एक कॉन्ट्रैक्ट होता है। इस परिभाषा से यह साफ होता है कि एक बिक्री समझौते में तय हुई शर्तों पर भविष्य में प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने का वचन होता है। लेकिन इस समझौते से प्रस्तावित खरीददार का संपत्ति में कोई अधिकार या हित नहीं बनता।
”अचल संपत्ति की बिक्री के लिए कॉन्ट्रैक्ट वो अनुबंध होता है जो इस तरह की संपत्ति को बेचने के लिए पार्टियों के बीच तय की गई शर्तों पर होगा यानी धारा 54. सेक्शन 54 आगे कहता है, ‘यह अपने आप में, ऐसी संपत्ति पर कोई हित या चार्ज नहीं बनाता है.”
ऊपर बताई गई परिभाषा से पता चलता है कि अग्रीमेंट फॉर सेल में एक वादा छिपा होता है कि भविष्य में कुछ नियम व शर्तों के तहत प्रॉपर्टी ट्रांसफर की जाएगी. इसलिए, यह समझौता खुद प्रस्तावित खरीदार के लिए संपत्ति में कोई अधिकार या हित पैदा नहीं करता है.
बिक्री समझौते के जरिए खरीददार को सिर्फ कुछ शर्तों पर घर खरीदने का अधिकार मिल जाता है। इसी तरह विक्रेता को भी नियम और शर्तों के अपने हिस्से का पालन करने पर खरीदार से विचार हासिल करने का अधिकार मिलता है। विक्रेता को खरीदार को संपत्ति बेचने या बेचने में नाकाम रहने की स्थिति में खरीदार को विशेष राहत अधिनियम, 1963 के प्रावधानों के तहत विशिष्ट प्रदर्शन का अधिकार मिलता है। एेसा ही अधिकार समझौते के तहत विक्रेता को भी मिलता है।
भले ही बिक्री के लिए समझौते पर साइन का मतलब यह नहीं है कि बिक्री पूरी हो गई है. यह उस दिशा में एक अहम कदम है. यही कारण है कि खरीदारों को समझौते में लिखी शर्तों के बारे में गहरी जानकारी होनी चाहिए

सेल अग्रीमेंट की अहमियत क्या है?

बिक्री के लिए एक समझौते पर दस्तखत करना कई कारकों के तहत अहम हो जाता है. सबसे पहले, यह खरीदार और विक्रेता के बीच एक समझौते का कानूनी प्रमाण है, जिसके आधार पर विवाद की स्थिति में, भविष्य की कार्रवाई का निर्णय लिया जाएगा.
ध्यान दें कि यहां दोनों पक्षों को समझौते में बिक्री के लिए निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा. अगर कोई भी पक्ष समझौते में लिखी किसी भी शर्त को नहीं मान रहा है तो दूसरा पक्ष चाहे तो उसे कोर्ट में घसीट सकता है. सभी पक्षों को इस फैक्ट पर भी ध्यान देना चाहिए कि इस दस्तावेज़ को  अदालत में कानूनी सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है और सभी इसका पालन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं.
इसके अलावा, अगर आप होम लोन के लिए आवेदन कर रहे हैं, तो बैंक आपके आवेदन को तब तक स्वीकार नहीं करेगा जब तक आप बिक्री के लिए एक समझौते पर दस्तखत नहीं करते.

क्या मौखिक हो सकता है सेल अग्रीमेंट?

ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट के सेक्शन 9 के मुताबिक प्रॉपर्टी टाइटल मौखिक अग्रीमेंट के जरिए ट्रांसफर किया जा सकता है लेकिन जब तक कि कानून स्पष्ट रूप से यह न कहे कि लेनदेन को समाप्त करने के लिए एक लिखित समझौता तैयार किया जाना चाहिए. 100 रुपये से कम की वैल्यू वाली अचल संपत्ति के मामले में ऐसे ट्रांसफर किसी रजिस्टर्ड साधन या फिर प्रॉपर्टी की डिलिवरी के तहत करना चाहिए. चूंकि ऐसा शायद ही कभी होता है, सभी बिक्री समझौते का दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए और एक मौखिक समझौता पर्याप्त नहीं होगा.

सेल डीड क्या होती है?

सेल डीड एक कानूनी दस्तावेज है जो यह साबित करता है कि विक्रेता ने संपत्ति का पूर्ण स्वामित्व खरीदार को ट्रांसफर कर दिया है. इस दस्तावेज़ के जरिए, संपत्ति के अधिकार और हित नए मालिक के पास चले जाते हैं. एक सेल डीड में आमतौर पर ये जानकारी होती है:-

1. खरीदारों और विक्रेताओं की जानकारियां (नाम, उम्र और पते)

2. प्रॉपर्टी का विवरण (कुल एरिया, कंस्ट्रक्शन की डिटेल्स, सटीक पता और परिवेश)

3. सेल अमाउंट, जिसमें अडवांस पेमेंट भी शामिल है. इसके अलावा मोड ऑफ पेमेंट.

4. टाइम फ्रेम जब संपत्ति का टाइटल वास्तव में खरीदार को दिया जाएगा.

5. पोजेशन की डिलिवरी की असली तारीख.

6. क्षतिपूर्ति खंड (विक्रेता स्वामित्व के संबंध में विवादों के मामले में किसी भी नुकसान के लिए खरीदार को भुगतान करने का वादा करता है, जिसके परिणामस्वरूप खरीदार को मौद्रिक नुकसान होता है)

क्या सेल डीड कन्वेयंस डीड के जैसी ही होती है?

भले ही आप इन दो शब्दों को सुनते रहे हों लेकिन सेल डीड और कन्वेयंस डीड दोनों अलग-अलग होते हैं. सेल डीड एक तरह की कन्वेयंस डीड होती है लेकिन कन्वेयंस डीड एक बड़ा शब्द है, जो गिफ्ट डीड, एक्सचेंज डीड, गिरवीनामा, लीज डीड इत्यादि को कवर करती है. आमतौर पर, ये सारे दस्तावेज विभिन्न प्रकार के कन्वेयंस डीड होती हैं.

प्रॉपर्टी लॉ के जानकार और लखनऊ के रहने वाले वकील प्रभांशु मिश्रा कहते हैं, “हर तरह का कानूनी दस्तावेज, जो प्रॉपर्टी का मालिकाना हक एक शख्स से दूसरे शख्स को ट्रांसफर करता है, वह कन्वेयंस डील होती है. उस मामले में, सेल डीड कन्वेयंस डीड भी होती है. खरीदारों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए और यह सोचकर भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि उन्हें एक नहीं बल्कि दो-दो प्रॉपर्टी दस्तावेजों की जरूरत पड़ेगी.”

प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन के वक्त सेल अग्रीमेंट

प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन के वक्त घर खरीदारों को दस्तावेजों की कॉपीज के साथ मौजूद रहना पड़ता है. ऐसा करना जरूरी है क्योंकि अधिकारी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि पहले से किए गए समझौते के आधार पर विक्रेता और खरीदार के बीच समझौता हो रहा है.

बिक्री समझौता और बैनामा पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश:

बिक्री के लिए अग्रीमेंट संपत्ति की वास्तविक बिक्री में हो भी सकता है और नहीं भी। महाराष्ट्र स्टैंप एक्ट जैसे कुछ स्टैंप ड्यूटी कानूनों में कन्वेयंस डीड की तरह अचल संपत्ति के लिए बिक्री समझौते का जिक्र है। इसलिए कन्वेयंस डीड पर जो स्टैंप ड्यूटी लगती है, वही एक अचल संपत्ति की बैनामे पर लगेगी। एेसे ही उपेक्षित प्रावधानों के कारण बिक्री समझौते पर स्टैंप ड्यूटी का भुगतान किया जाता है। लोग अकसर बिक्री समझौते को बैनामा समझ लेते हैं।
साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने पावर अॉफ अटॉर्नी के जरिए बनाई गई अचल संपत्तियों की बिक्री की वैधता से जुड़े सूरज लैंप एंड इंडस्ट्री (प्रा) लिमिटेड (2) बनाम हरियाणा राज्य के मामले में कहा था, ”अचल संपत्ति को केवल कन्वेयंस डीड (सेल डीड) के जरिए ट्रांसफर/कन्वेयड किया जा सकता है, जिसे तय कानून के मुताबिक स्टैंप्ड और रजिस्टर्ड होना भी जरूरी है। इसलिए अचल संपत्ति को केवल कानूनी तौर पर रजिस्टर्ड कन्वेयंस डीड के जरिए ही ट्रांसफर/कन्वेयड किया जा सकता है”।
”कोई भी बिक्री अनुबंध, जो पंजीकृत कन्वेयंस डीड नहीं है, वह ट्रांसफर अॉफ प्रॉपर्टी एक्ट के सेक्शन 54 और 55 की योग्यताओं को पूरा नहीं पाएगा। एेसे में उसे न तो कोई शीर्षक (टाइटल) मिलेगा और न ही अचल संपत्ति में कोई हित” (केवल ट्रांसफर अॉफ प्रॉपर्टी एक्ट के सेक्शन 53ए के तहत सीमित अधिकार ही दिए जाएंगे)।
ट्रांसफर अॉफ प्रॉपर्टी एक्ट के मुताबिक एक बिक्री समझौता, चाहे वह पोजेशन के साथ हो या उसके बिना, कन्वेयंस नहीं है। ट्रांसफर अॉफ प्रॉपर्टी एक्ट के सेक्शन 54 के मुताबिक किसी अचल संपत्ति की बिक्री सिर्फ रजिस्टर्ड इंस्ट्रूमेंट के जरिए ही की जा सकती है और बिक्री समझौते का इस विषय पर कोई हित या शुल्क नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट ने आगे बिल्डर और खरीदार के बीच बिक्री समझौते की अहमियत को दोहराया. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि रियल एस्टेट (रेग्युलेशन एंड डेवेलपमेंट) एक्ट 2016 के तहत किसी किसी घर खरीदार को आवास इकाई के आवंटन की अवधि को बिल्डर-खरीदार समझौते की तारीख से माना जाना चाहिए ना कि प्रोजेक्ट की रजिस्ट्रेशन की तारीख से. कोर्ट ने आगे कहा कि RERA प्राधिकारी बिक्री समझौते के अनुसार बिल्डर से मुआवजा मांगें, जिसकी पवित्रता को इस आदेश के माध्यम से बरकरार रखा गया है.

अगर बैनामा नाकाम हो जाए तो क्या होगा…?

इंडियन रजिस्ट्रेशन एक्ट 1908 के मुताबिक किसी अचल संपत्ति, जिसकी वैल्यू एक रुपये से ज्यादा है, में अगर हितों का ट्रांसफर करना है तो उसका पंजीकरण जरूरी है। अगर आपने कोई संपत्ति सही बैनामे के बजाय बिक्री समझौते के तहत खरीदी है तो उस संपत्ति में आपका कोई अधिकार या हित नहीं होगा। ट्रांसफर अॉफ प्रॉपर्टी एक्ट के सेक्शन 53ए के तहत यह पूर्ण नियम एक अपवाद है। सेक्शन 53ए के मुताबिक अगर खरीददार ने प्रॉपर्टी का पोजेशन पा लिया है और वह ट्रांसफर का विषय है तो एेसे में समझौते के तहत विक्रेता खरीददार दिए गए पोजेशन में दखलअंदाजी नहीं कर पाएगा।
यह ध्यान देने वाली बात है कि सेक्शन 53ए प्रस्तावित हस्तांतरी को हस्तांतरणकर्ता के खिलाफ एक ढाल प्रदान करता है और हस्तांतरणकर्ता को हस्तांतरी के पोजेशन में दखलअंदाजी करने से रोकता है। लेकिन इससे संपत्ति के खरीददार के शीर्षक का बचाव नहीं होता। प्रॉपर्टी का मालिकाना हक विक्रेता के पास ही रहेगा।
इसलिए अगर आपने कोई भी प्रॉपर्टी बिक्री समझौते के तहत खरीदी है और आपको पोजेशन भी मिल गई है तब भी प्रॉपर्टी टाइटल उस वक्त तक डिवेलपर के पास ही रहेगा, जब तक इंडियन रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत अलग से बैनामा तैयार और पंजीकृत नहीं हो जाता। इसलिए यह साफ है कि अचल संपत्ति का शीर्षक सिर्फ बैनामे के जरिए ही ट्रांसफर किया जा सकता है। अगर पंजीकृत और रजिस्टर्ड बैनामा नहीं है तो संपत्ति में खरीददार का कोई अधिकार या हित नहीं माना जाएगा।

पूछे जाने वाले सवाल

क्या होता है अग्रीमेंट फॉर सेल?

बिक्री के लिए समझौता, भविष्य में एक संपत्ति को बेचने के लिए एक समझौता है. इस अग्रीमेंट में वो नियम व शर्तें लिखी होती हैं, जिसके तहत प्रॉपर्टी ट्रांसफर की जाती हैं.

क्या होती है सेल डीड?

सेल डीड के मुख्य कानूनी दस्तावेज है, जिसके जरिए विक्रेता अपने प्रॉपर्टी के अधिकार खरीदार को ट्रांसफर कर देता है और प्रॉपर्टी का मालिकाना हक नए मालिक के पास चले जाते हैं.

सेल डीड और अग्रीमेंट फॉर सेल के बीच क्या फर्क होता है?

बिक्री समझौता भविष्य के लिए एक वादा होता है कि प्रॉपर्टी मालिक को ट्रांसफर कर दी जाएगी, जबकि सेल डीड में वास्तविक में स्वामित्व खरीदार को ट्रांसफर कर दिया जाता है.

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