जानिए कैसा होगा घर ग्राहकों और रियल एस्टेट सेक्टर पर जीएसटी का असर

चार अतिरिक्त कानूनों- केंद्रीय जीएसटी विधेयक 2017, एकीकृत जीएसटी विधेयक 2017, जीएसटी (राज्यों को मुआवजा) विधेयक, 2017 और केंद्र शासित प्रदेश जीएसटी विधेयक 2017 के साथ जीएसटी विधेयक को लोकसभा से मार्च 29 2017 को मंजूरी दी गई थी।

Table of Contents

चार अतिरिक्त कानूनों- केंद्रीय जीएसटी विधेयक 2017, एकीकृत जीएसटी विधेयक 2017, जीएसटी (राज्यों को मुआवजा) विधेयक, 2017 और केंद्र शासित प्रदेश जीएसटी विधेयक 2017 के साथ जीएसटी विधेयक को लोकसभा से मार्च 29 2017 को मंजूरी दी गई थी। विधेयक के पारित होने से पहले हुई बहस के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि जीएसटी यूनिफॉर्म इनडायरेक्ट टैक्स सिस्टम में शामिल होगा, जिससे सामान ‘थोड़े सस्ते’ हो जाएंगे। उन्होंने कहा, ”आज टैक्स के ऊपर टैक्स लगा हुआ है, जिसका सोपानी प्रभाव पड़ता है। जब ये सब हट जाएंगे तो सामान सस्ते हो जाएंगे”। जीएसटी परिषद् ने कई जीएसटी दरों पर फैसला क्यों किया है? इस सवाल के जवाब में वित्त मंत्री जेटली ने कहा कि एक दर बहुत प्रतिगामी होगी, क्योंकि हवाई चप्पल और बीएमडब्ल्यू पर एक जैसा टैक्स नहीं लगाया जा सकता।

क्या है जीएसटी का मकसद:

एक यूनिफॉर्म मार्केट बनाने के मकसद से जीएसटी ने सेंट्रल एक्साइज, सर्विस टैक्स, VAT और अन्य स्थानीय टैक्स की जगह ली है। उम्मीद है कि जीएसटी जीडीपी की विकास दर में दो प्रतिशत की वृद्धि करेगा और टैक्स चोरी पर लगाम लगाएगा। राज्यों ने अपने यहां जीएसटी या एसजीएसटी कानून को पारित किया है, जो वैट के समाहित होने के बाद सेल्स टैक्स लगाने की अनुमति देगा।

जीएसटी के तहत टैक्स संरचना:

जीएसटी काउंसिल ने चार तरह के टैक्स रेट की सिफारिश की है-5, 12,18 और 28 प्रतिशत। उच्चतम स्लैब के ऊपर लग्जरी और खराब सामान पर सेस लगाया जाएगा, ताकि जीएसटी लागू होने के पहले 5 वर्षों में राज्यों के राजस्व को होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके। हालांकि केंद्रीय जीएसटी (CGST) ने पीक रेट 20 प्रतिशत तय किया है और यही दर राज्य जीएसटी (SGST) में निर्धारित है, इससे पीक रेट 40 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा, लेकिन यह वित्तीय जरूरतों के वक्त ही लागू होगा।

टैक्स पर जीएसटी का प्रभाव:

पुराने टैक्स सिस्टम में नागरिकों को कई तरह के टैक्स जैसे वैट व अन्य स्थानीय टैक्स चुकाने पड़ते थे, लेकिन अब इनकी जगह जीएसटी ने ले ली है। CREDAI-MCHI के चेयरमैन (एग्जीबिशन) दीपेश भगतानी ने कहा था कि अलग-अलग शहरों में विभिन्न टैक्स चुकाने की जगह अब सिर्फ एक टैक्स चुकाना होगा और इससे हमें फायदा होगा। इस प्रक्रिया में बड़ी रकम के साथ काफी मेहनत की भी बचत होगी। उन्होंने कहा कि बतौर इंडस्ट्री हम काफी टैक्स से पीड़ित हैं, जिनका अमाउंट 40 प्रतिशत है। अगर इन सभी में कमी आती है तो हमारे लिए एक बड़ा फायदा है।

रियल एस्टेट की लेनदेन के दौरान इन शहरों में लगता है इतना टैक्स:

टैक्स                     बेंगलुरु                 मुंबई                पुणे                चेन्नई                    गुरुग्राम
वैट                        4.0%                   1.0%               1.0%             2.0%                   4.0%
सर्विस टैक्स            4.5%                    4.5%               4.5%            4.5%                    4.5%
स्टैंप ड्यूटी              5.7%                   5.0 %               5.0%            7.0%                    6.0%
रजिस्ट्रेशन              1.0%                   1.0%               1.0%             1.0%                    0.5%
कुल टैक्स               15.2%                  11.5%             11.5%          14.5%                  15.0%

जीएसटी का रियल एस्टेट पर प्रभाव:

किसी इमारत को बनाने या खरीददार को बेचने पर पूरे इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के साथ 12 प्रतिशत टैक्स लगेगा। वही आईटीसी के ओवरफ्लो के मामले में कोई रिफंड नहीं मिलेगा। दूसरे शब्दों में कहें तो रिहायशी निर्माण की सेवाओं में 12 प्रतिशत का जीएसटी लगेगा। यह उन बिल्डरों पर लागू होगा, जो कंस्ट्रक्शन पूरा होने से पहले फ्लैट्स घर खरीददारों को बेचेंगे। जीएसटी पर जेएम फाइनेंशियल रिपोर्ट के मुताबिक, गैर संयुक्त वैट वाले राज्यों (कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश) के लिए नए टैक्स सिस्टम के तहत लेनदेन का मूल्य 10 से 11% से घटकर 12% हो गया है। इनपुट कॉस्ट क्रेडिट उपलब्ध होने के साथ इन राज्यों में डेवलपरों के मुनाफे में कोई सुधार नहीं किया जा सकता।
जेएम फाइनेंशियल लिमिटेड के असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट (इक्विटी रिसर्च) अभिषेक आनंद ने कहा, ‘पुराने सिस्टम में समग्र वैट वाले राज्यों में बिल्डर्स को कुल संपत्ति मूल्य पर कम VAT रेट चुकाना पड़ाता था, वह भी बिना किसी इनपुट टैक्स फायदे या आंशिक लाभ के। जीएसटी में डिवेलपर्स लेन-देन की लागत- वैट (1%) और सर्विस टैक्स (4-5%) खरीदार को पास करते हैं (कुल 5-6%)। डिवेलपर्स को केवल इनपुट सर्विस टैक्स के लिए ऑफसेट मिलता है। जीएसटी सिस्टम में लेन-देन की लागत 12% तक बढ़ जाती है, जिसमें इनपुट क्रेडिट सर्विस और मटीरियल दोनों पर उपलब्ध होता है। अगर डिवेलपर कोई इनपुट क्रेडिट नहीं देता तो प्रॉपर्टी लेनदेन की लागत 6 प्रतिशत बढ़ जाएगी। अगर डिवेलपर्स इनपुट क्रेडिट का फायदा ग्राहकों को देते हैं तो प्रॉपर्टी की कीमत 1-2 प्रतिशत पर सीमित हो जाएगी”।

क्या जीएसटी से घर ग्राहकों को फायदा होगा?

गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST) आने के साथ ही टैक्स दरें 5.5 प्रतिशत से बढ़कर 12 प्रतिशत हो गई हैं। हालांकि डिवेलपर्स कंस्ट्रक्शन के दौरान खरीदे और खर्च किए गए सभी सामानों और सर्विसेज पर इनपुट क्रेडिट का लाभ उठा सकेंगे। CREDAI पुणे मेट्रो के अध्यक्ष श्रीकांत परांजपे ने कहा कि प्रॉपर्टी की कीमतों पर जीएसटी के प्रभाव को मापना इस स्टेज पर कठिन होगा, क्योंकि भूमि मूल्य में कमी की स्थिति साफ नहीं है। उन्होंने कहा, एक प्रॉडक्ट, जिसमें न तो कच्चा माल और न ही पूरी यूनिट जीएसटी के तहत कवर है, उसमें टैक्स इनपुट के फायदे को कैलकुलेट करना या सही ठहराना मुश्किल होगा। सिर्फ मार्केट ताकतें, रेडी रेनकर रेट्स और समय ही तय करेगा कि बिल्डर्स ग्राहकों को कितना फायदा पहुंचाएंगे। इसके अलावा इनपुट सामग्री की कीमतें भी अस्थिर हो सकती हैं। सीमेंट और स्टील की कीमतें बिना किसी चेतावनी के आसमान छू सकती हैं। इसी तरह रेत की सप्लाई हमेशा कम रहती है और मॉनसून में यह उपलब्ध नहीं रहता। इसलिए संभावना है कि इंडस्ट्रीज टैक्स क्रेडिट का पूरा फायदा ग्राहकों को नहीं देंगे।
एक अन्य अहम फैक्टर जिसकी जांच करने की जरूरत है, वह कंस्ट्रक्शन की स्टेज है। अगर प्रोजेक्ट अडवांस स्टेज पर है, जिसमें जीएसटी लागू होने से पहले ही पर्याप्त खर्चा किया जा चुका है, वहां इनपुट क्रेडिट बहुत कम मात्रा में उपलब्ध होगा और उतना ही कम मात्रा में फायदा दिया जाएगा। अगर प्रोजेक्ट शुरुआती चरण में है तो ज्यादा फायदा दिए जा सकते हैं।

निर्माणाधीन संपत्ति पर जीएसटी-किफायती आवास:

यह ध्यान देने वाली बात है कि अगर जीएसटी की छूट किफायती हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के लिए भी दी गई है (किफायती आवास पर फिलहाल सर्विस टैक्स से छूट मिली हुई है और जीएसटी से छूट के लिए सरकार से स्पष्टीकरण की उम्मीद है), तो किफायती घर जीएसटी में सस्ते हो सकते हैं।

प्रॉपर्टी की कीमतों पर जीएसटी का प्रभाव-लग्जरी सेगमेंट:

प्रीमियम प्रॉपर्टीज के मामले में मूल लागत थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन इनपुट टैक्स क्रेडिट 12 प्रतिशत तक सीमित है, इसलिए अन्य खर्चों पर टैक्स चुकाए जाने के कारण फ्रेश टैक्स लायबिलिटी को शून्य तक लाना काफी नहीं होगा।

रियल एस्टेट के लिए जीएसटी रेट्स-इनपुट मटीरियल

HSN                                       गुड्स का ब्योरा                                               दरें
चैप्टर 72                                          स्टील                                               18 प्रतिशत
2523                                            सीमेंट                                                28 प्रतिशत
6802                                    मार्बल एवं ग्रेनाइट                                      28 प्रतिशत
2515                               मार्बल के ब्लॉक एवं ग्रेनाइट                               12 प्रतिशत
चैप्टर 68                             रेत की चूने और राख की ईंटें                           12 प्रतिशत
2505                            प्राकृतिक रेत, कंकड़, बजरी                                5 प्रतिशत
और 2517
8428                          लिफ्ट और एलिवेटर्स                                             28 प्रतिशत
टैक्स सिस्टम के तहत कंस्ट्रक्शन के कई सामान 18 और 28 प्रतिशत के स्लैब में है। उदाहरण के तौर पर स्टील और स्टील प्रॉडक्ट्स ज्यादातर 18 प्रतिशत के सेगमेंट में है और सीमेंट के अलावा सिविल इंजीनियरिंग के लिए अन्य अहम चीजें 28 प्रतिशत स्लैब में हैं। हालांकि इनपुट टैक्स क्रेडिट कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल होने वाले प्रॉडक्ट्स में उपलब्ध है, इसलिए बाकी टैक्स को हटा दिया जाना चाहिए।

जीएसटी में रिवर्स चार्ज मिकैनिजम और कंस्ट्रक्शन लागत पर उसका प्रभाव:

जिस मिकैनिजम में सर्विस पाने वाला सर्विस टैक्स चुकाता है, उसे रिवर्स चार्ज मिकैनिजम (RCM) कहा जाता है। यही कॉन्सेप्ट बड़े स्तर पर सर्विस टैक्स कानूनों से गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST) में लिया गया है। एक बिल्डर को सर्विसेज पर जीएसटी का भुगतान करना पड़ता है। वह सर्विसेज जो माल ट्रांसपोर्टर, एक शख्स या कंपनी द्वारा दी जाती हैं।
जो सेवाएं सरकार या स्थानीय निकाय जैसे म्युनिसिपैलिटी मुहैया कराती हैं, उन पर बिल्डर को रिवर्स चार्ज मिकैनिजम के तहत जीएसटी चुकाना पड़ता है। फिर भी, सरकार द्वारा दी जाने वाली कुछ सेवाओं जैसे किराए पर परिसर, डाक, रेलवे या राज्य परिवहन को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है। रिवर्स चार्ज मिकैनिजम के तहत जीएसटी के तहत रजिस्टर्ड किसी शख्स को उन सभी समानों और सेवाओं पर जीएसटी चुकाना पड़ता है और ये सेवाएं एेसे शख्स से ली जाती हैं, जो जीएसटी के तहत रजिस्टर्ड नहीं है। इसने सभी टैक्स चुकाने वाले लोगों के लिए रिवर्स मिकैनिजम का दायरा बढ़ा दिया है और इससे डिवेलपर्स पर उलटा असर पड़ेगा। इसके अलावा जीएसटी में रिवर्स मिकैनिजम के तहत भुगतान किया गया टैक्स डिवेलपर्स जीएसटी में उपलब्ध इनपुट क्रेडिट के खिलाफ एडजस्ट नहीं कर सकते। इसे कैश या बैंक के जरिए भुगतान किया जाता है।
इसलिए, जीएसटी के कारण बिल्डरों की स्थिति बदतर है। उन पर इसकी वजह से दोहरी मार पड़ी है, क्योंकि उन्हें गैर पंजीकृत शख्स से सर्विसेज पाने और गैर पंजीकृत सप्लायर्स से मिलने वाले सामानों पर रिवर्स टैक्स चुकाने के लिए लेवी देनी पड़ती है। इस कारण छोटे डिवेलपर्स की लागत बढ़ जाएगी, क्योंकि वे गैर-पंजीकृत सप्लायर्स से सामान और सेवाएं लेते रहे हैं और उस पर टैक्स भी नहीं चुकाते।

रेडी टू मूव प्रॉपर्टीज पर जीएसटी:

अगर प्रोजेक्ट को अॉक्युपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) मिल चुका है तो जीएसटी लागू नहीं होगा। CRISIL रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल बिल्डर्स सीमेंट और स्टील पर एक्साइज टैक्स और वैट क्रमश: 27.7% व 18.1% चुकाते हैं। यह दर हर राज्य में अलग-अलग होती है। अब नए टैक्स सिस्टम में सीमेंट और स्टील पर क्रमश: 28% व 18% जीएसटी चुकाना होगा। जबकि अन्य चीजें जैसे पेंट पर 28 प्रतिशत टैक्स लगेगा। जबकि हाउसिंग यूनिट पर 12 प्रतिशत टैक्स लगाया जाएगा। चूंकि जमीन सहित पूरी लागत पर 12 प्रतिशत लगाया जाएगा, इसलिए बिल्डर्स के पास इनपुट क्रेडिट देने के लिए पर्याप्त रकम होगी। इसलिए जो ग्राहक रेडी टू मूव अपार्टमेंट ले रहा है, उस पर टैक्स का बोझ नहीं पड़ेगा।
लेकिन जीएसटी के तहत रियल एस्टेट के लिए टैक्स की गणना इतनी आसान नहीं है। उदाहरण के तौर पर अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में ग्राहकों को बिक्री मूल्य पर जीएसटी चुकाना होगा। लेकिन बिल्डर्स सिर्फ कंस्ट्रक्शन की लागत पर ही क्रेडिट हासिल कर सकते हैं। बतौर बिल्डर आपको पूरे प्रोजेक्ट पर जीएसटी चुकाना होगा, लेकिन इनपुट सिर्फ कंस्ट्रक्शन की लागत पर ही हासिल किया जा सकता है। यहां एक अंतर है, जो 30 प्रतिशत से कम नहीं हो सकता। इसलिए चाहे आप अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी लें या रेडी टू मूव, बिल्डर उस अनुपात में कीमतें बढ़ाकर उस अंतर को भरेगा।

संपत्ति के किराये पर जीएसटी:

बीडीओ इंडिया, इनडायरेक्ट टैक्स के पार्टनर और हेड अमित सरकार ने कहा, ”अगर कंप्लीशन सर्टिफिकेट या फर्स्ट अॉक्युपेंसी से पहले ही बिक्री हो जाती है तो डिवेलपर के लिए इनपुट जीएसटी का क्रेडिट/ सेट-ऑफ उपलब्ध है। लेकिन अगर डिवेलपर ने प्रॉपर्टी रेंट पर देने का फैसला किया है तब यह क्रेडिट नहीं मिलेगा। इसलिए हमें कमर्शियल रेंटल्स में मुश्किलें देखने को मिल सकती हैं”। इसके अलावा रहने के लिए इस्तेमाल होने वाली आवासीय संपत्ति के किराये पर भी जीएसटी लगाया गया है। इसलिए किरायेदारों को जीएसटी सिस्टम के तहत किराये में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है, क्योंकि मौजूदा सिस्टम में रिहायशी संपत्तियों पर कोई सर्विस टैक्स लागू नहीं होता।

जानिए कैसे जीएसटी किराये से होने वाली इनकम पर टैक्स कैलकुलेशन को प्रभावित करेगा:

जीएसटी के लागू होने से पुराने सभी टैक्स खत्म हो गए हैं। इसलिए सर्विस और सामान पर अलग-अलग टैक्सों के बारे में भ्रम भी दूर हो गया है। सर्विस टैक्स सिस्टम के तहत जीएसटी के प्रयोज्यता की सीमा 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख कर दी गई है। इसलिए कई मकानमालिक जो सर्विस टैक्स सिस्टम के तहत आते हैं, वे जीएसटी के तहत इनडायरेक्ट टैक्स नेट से बाहर हो जाएंगे।
यह भी ध्यान में रखना दिलचस्प है कि जीएसटी के तहत 20 लाख रुपये की कुल सीमा की गणना करने का मकसद टैक्सेबल और छूट वाले सामानों और सेवाओं की सप्लाई पर नजर रखना है। इसलिए सर्विस टैक्स सिस्टम से उलट, जहां सिर्फ टैक्सेबल सर्विस टैक्स सिस्टम है, वहां यह देखा जाता है कि आपने मूल सीमा पार की या नहीं। लेकिन जीएसटी के तहत भारत में सप्लाई की जाने वाली सभी सर्विसेज और चीजों की कीमत के साथ-साथ कर योग्य या छूट के मामले में 20 लाख रुपये की सीमा पर विचार किया जाता है। कमर्शियल प्रॉपर्टी को किराये पर देने पर 18 प्रतिशत जीएसटी चुकाना प्रस्तावित है।
व्यावसायिक संपत्तियों पर किराए के संबंध में जीएसटी के तहत एक और बड़ी टैक्स उलझन है। जीएसटी में रिवर्स चार्ज मिकैनिजम का विषय सर्विस टैक्स सिस्टम से लिया गया है। हालांकि सर्विस टैक्स सिस्टम से उलट रिवर्स चार्ज मिकैनिजम सर्विसेज के मामलों में लागू होता है। इसका विस्तार बिक्री या सामानों के उत्पादन में नहीं होता। यही जीएसटी में सामानों और सर्विसेज पर भी लागू होता है। एक शख्स जो जीएसटी के तहत रजिस्टर्ड है, उसे एेसे शख्स से सामानों की सप्लाई होती है, जो जीएसटी के तहत पंजीकृत नहीं है, उसे रिवर्स चार्ज मिकैनिजम के तहत जीएसटी का भुगतान करना पड़ेगा। सर्विस टैक्स सिस्टम के तहत ठेकेदार द्वारा चुकाए जाने वाले किराये के संबंध में रिवर्स चार्ज मिकैनिजम का कोई प्रावधान नहीं था। रिवर्स चार्ज मिकैनिजम के तहत बढ़ी हुई कीमतें और लेवी के कारण प्रस्तावित जीएसटी प्रावधान किराये पर किसी कमर्शियल परिसर को लेना महंगा बना देंगे।
क्यों जीएसटी होम लोन को महंगा कर देगा?: होम लोन की कीमतों पर जीएसटी के प्रभाव का मूल्यांकन करने से पहले यह समझना जरूरी है कि कौन-कौन सी चीजों पर जीएसटी के तहत बढ़ती कीमतों का प्रभाव पड़ेगा। होम लोन लेने की मुख्य लागत, पैसे पर ब्याज का भुगतान करना है। यह कीमत नहीं बदलेगी, क्योंकि इस पर न तो सर्विस टैक्स है और न ही जीएसटी। इसी तरह होम लोन दस्तावेज के संबंध में लगने वाली स्टैंप ड्यूटी जीएसटी के साथ नहीं बदलेगी, क्योंकि जीएसटी के तहत स्टैंप ड्यूटी को शामिल नहीं किया गया है।
हालांकि होम लोन पर कर्जा देने वाले कई चार्जेज लगाते हैं। सबसे पहले होम लोन लेते वक्त प्रोसेसिंग फीस चुकानी पड़ती है। फिलहाल यह 15 प्रतिशत है, लेकिन जीएसटी के तहत यह 3 प्रतिशत बढ़कर 18 प्रतिशत हो जाएगी। यह एक बार चुकाई जाती है और इससे आपकी होम लोन अवधि पर कोई असर नहीं पड़ता। इसके अलावा होम लोन के संबंध में बैंक एडवोकेट फीस, वैल्यूएशन चार्जेज जैसे शुल्क भी वसूल करता है, जो आनुपातिक रूप से बढ़ जाएगा। जैसे प्रोसेसिंग फीस का एप्लिकेशन के वक्त भुगतान किया जाता है, उसी तरह अगर आप होम लोन को उसकी अवधि पूरी होने से पहले चुकाते हैं या किसी अन्य कर्जदाता को शिफ्ट करते हैं तो आपको प्रीपेमेंट चार्जेज चुकाना पड़ सकता है। अगर होम लोन एक निश्चित ब्याज दर के तहत वसूला जाता है तो यह आमतौर पर चुकाना होता है।
वहीं फ्लोटिंग रेट होम लोन के लिए बैंक प्रीपेमेंट शुल्क नहीं ले सकते। अगर आप होम लोन किसी अन्य कर्जदार को शिफ्ट करते हैं तो हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां प्रीपेमेंट चार्जेज लगा सकती हैं। लेकिन अगर आप खुद के संसाधनों से होम लोन का भुगतान करते हैं तो हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां किसी तरह के प्रीपेमेंट चार्जेज नहीं वसूल सकतीं। अगर आप कोई ईएमआई नहीं चुका पाते तो कर्जदाता या तो चेक वापस होने या ईसीएस रिटर्न पर इसका शुल्क वसूल सकते हैं, जिस पर जीएसटी दरें बढ़ जाएं। इसलिए व्यवहारिक तौर पर जो भी शुल्क कर्जदाता द्वारा वसूले जाते हैं, उन पर जीएसटी 3 प्रतिशत बढ़ जाएगा।

जीएसटी के कारण बैंकों पर क्या प्रभाव पड़ा?

जीएसटी के लागू होने पर कर्जदाता कुछ टैक्स बचा पाएंगे, क्योंकि सर्विसेज पाने और सामान खरीदने के संबंध में इनपुट क्रेडिट जीएसटी आउटपुट टैक्स लायबिलिटी के खिलाफ सेट अॉफ के लिए उपलब्ध रहेगा। लेकिन सर्विस टैक्स सिस्टम से लिया गया रिवर्स चार्ज मिकैनिजम, जिसका जीएसटी के तहत विस्तार किया गया है, वह बैंकों के प्रॉफिट को प्रतिकूल तरीके से प्रभावित करेगा। इसके अलावा कर्जदाताओं को अब जीएसटी के तहत सभी राज्यों में पंजीकृत होना होगा। जबकि सर्विस टैक्स सिस्टम के तहत वह केंद्रीय पंजीकरण कर सकते थे। इससे कर्जदाताओं की अनुपालन लागत बढ़ेगी और प्रॉफिटेबिलिटी प्रभावित होगी।

जीएसटी के वो एरिया जो प्रॉपर्टी की आखिरी कीमत निर्धारित कर सकते हैं?

यह अब भी साफ नहीं है कि निर्माणाधीन प्रोजेक्ट्स में सर्विस टैक्स की कैलकुलेशन करने के लिए जमीन की कीमत में क्या कमी आएगी। डिवेलपर्स के लिए सर्विस टैक्स सिस्टम और इनपुट टैक्स क्रेडिट सुविधा में लागू होने वाले कमी नियम तय करेंगे कि जीएसटी के तहत रियल एस्टेट पर प्रभावी टैक्स की घटनाएं कम हैं या ज्यादा। मकान के लागत की 75 प्रतिशत की सीमा तक भूमि की लागत के खिलाफ कमी को मंजूरी देने वाली संरचना योजना में 1 करोड़ रुपये और 2,000 वर्ग फुट से कम की रिहायशी इकाइयों की प्रभावी दर 3.75 फीसदी पर है। अन्य मामलों में कमी 70 प्रतिशत नीचे जा सकती है, जिससे प्रभावी दर 4 प्रतिशत हो जाती है। जीएसटी रियल एस्टेट पर टैक्स के मामले में कैसा प्रभाव डालेगा, यह जानने के लिए लंबा रास्ता तय करना है। चूंकि राज्यों में विभिन्न टैक्स हैं, इसलिए जीएसटी का परिणाम सभी राज्यों में एक जैसा नहीं हो सकता।

रियल एस्टेट को जीएसटी के तहत लाने के मजबूत कारण: वित्त मंत्री अरुण जेटली

12 अक्टूबर 2017 को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एक भाषण के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि आदर्श तौर पर रियल एस्टेट सेक्टर को जीएसटी के दायरे में लाया जाना चाहिए। अरुण जेटली ने कहा, ”भारत के जिस सेक्टर में सबसे ज्यादा टैक्स चोरी और कैश पैदा होता है, वह रियल एस्टेट है और यह जीएसटी के दायरे से बाहर है। कुछ राज्य इसके लिए दबाव डाल रहे हैं। लेकिन निजी तौर पर मैं मानता हूं कि रियल एस्टेट को जीएसटी के दायरे में लाने के मजबूत कारण हैं”। जेटली ने कहा कि इस कदम से ग्राहकों को फायदा होगा, क्योंकि उन्हें पूरे उत्पाद पर एक ही टैक्स चुकाना होगा। नतीजन, जीएसटी के तहत पूरे उत्पाद पर आखिरी टैक्स का भुगतान बहुत कम होगा।

क्या रियल एस्टेट और घर ग्राहकों को जीएसटी से फायदा होगा?

रियल एस्टेट में जीएसटी लागू होने से पहले एेसे कई मुद्दे हैं, जिनसे निपटने की जरूरत है। NAREDCO के अध्यक्ष निरंजन हीरानंदानी ने कहा कि रियल एस्टेट को जीएसटी के दायरे में लाने से ग्राहकों को फायदा होगा, क्योंकि उन्हें पूरे उत्पाद पर केवल एक टैक्स चुकाना होगा। हालांकि अगर रियल एस्टेट के लिए जीएसटी का स्लैब 12 प्रतिशत तय किया जाता है तो बिल्डरों और ग्राहकों दोनों को झटका लगेगा। वह इसलिए क्योंकि कई जगहों पर आज भी प्रॉपर्टी की कीमतें पहुंच से बाहर हैं। इसके अलावा वित्त मंत्री को सभी राज्यों को साथ लाने के लिए आम सहमति बनानी होगी। यह उन राज्यों में लिए काफी कठिन होगा, जहां स्टैंप ड्यूटी और प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन के जरिए रियल एस्टेट की लेनदेन आय का अहम स्रोत है
Was this article useful?
  • 😃 (0)
  • 😐 (0)
  • 😔 (0)

Comments

comments